गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

तेरे कूचे से

तेरे कूचे से जब निकले , एक अपना ही सहारा था
दारियां में बस हम ही थे, न कश्ती थी न किनारा था

वो एक खुदा के आगे, खाती थी सारी कसमे
न कसमें वो उसकी थी, न खुदा वो हमारा था

उस एक रात की खातिर, जिए हम कितनी ज़िंदगी
वो एक दिन हमने कुछ ऐसे मर मर के गुज़ारा था

मैं उस वक्त के ख्वाब , अक्सर रातो को देखता हूँ
जब तुम अजनबी थे, मेरा कोई ख्वाब न तुम्हारा था

वो अजनबियों से जाकर कहता था मेरे किस्से
मेरी मोहब्बत का क़र्ज़ , उसने कुछ इस तरह उतारा था

-तरुण

3 टिप्‍पणियां:

  1. hey tarun...

    dil ko chu gayi yaar tumhari kavita...great work...specially lines like
    वो एक खुदा के आगे, खाती थी सारी कसमे
    न कसमें वो उसकी थी, न खुदा वो हमारा था

    really...yeah kavita har padhne waale ke dil ke paas hogi

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  2. उस एक रात की खातिर, जिए हम कितनी ज़िंदगी
    वो एक दिन हमने कुछ ऐसे मर मर के गुज़ारा था

    Beautiful expression!

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