शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

मौसम आते जाते है


मौसम आते जाते है
हर साल सर्दी की ठंडी
हवाओ से
सब फूल पौधे कंपकपाते है
सारे पत्ते झड़ते जाते है
फिर बहार लौटकर आती है
महक उठती है सारी वादी
सब फूल पौधे फिर खिल जाते है
मौसम आते जाते है
लेकिन
जब से तुम गए हो
लौटकर नही आये
मैं भी ठिठुरा हूँ
मैं भी मुरझाया हूँ
बिखरा है मेरा भी पत्ता पत्ता
तुम लेकिन नही आये

-तरुण

2 टिप्‍पणियां:

  1. ausam patjhad thandabhi gujar jayega,basant ka intazaar kare,wo bhi aayega/aayegi,kavita bahut chan chan(sundar) aahe.

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  2. दिल कर रहा है कि बैठकर सारी रात अपनी रचनाएँ पढूँ... मेरी भावनाओं के बहुत समीप लिखते हैं आप...

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