ek orkut message ke reply mein likhi gayee ..
(http://www.orkut.com/CommMsgs.aspx?cmm=53370&tid=5207754778237288188&na=4)
तपती जिंदगी की दोपहर से
निकलकर जब भी
तेरी यादों की छाँव में बैठता हूँ
वो तेरा ख्याल आज भी मुझे
उस गुज़रे से वक्त के मखमली
एहसास में ले जाता है
जहाँ तुम मेरे घर में मेरा साया बने हुई थी
मैं कभी हर साँस पे तेरा चेहरा देखता था
और कभी
तेरा चेहरा देखकर साँस लेता था
तू जब मुस्कुराती थी
जब भी तेरे हंसने की आवाज़ से
मेरा घर गूंजता था
तो ऐ जानम
मुझे मेरी जिंदगी मुकम्मल लगती थी
और फिर आज
उस गुज़रे से कल में जाकर
में अपनी जिंदगी महसूस कर लेता हूँ
वरना तेरे जाने के बाद ये जिंदगी जिंदगी तो नही लगती
तेरा ख्याल आज भी
मुझे साँसे देता है
और जब भी उन यादो की आवाज़
मेरे कानो में गूंजती है
कही नही कही मुझे
मेरी जिंदगी कुछ लम्हों को मुकम्मल सी लगती है
-तरुण
Friday, June 27, 2008
तेरा ख्याल
Posted by
tarun
at
5:28 PM
0
comments
Thursday, June 26, 2008
तेरी बातें तुझे सुनायी
साँसों की आवाजों से जब पूछा
आवाज़ तेरी ही आयी
मन की आँखों से जब देखा
तस्वीर नज़र तेरी ही आयी
दिल की राहो पे जब चला
एक मंजिल तेरी ही पाई
तू जो है वो तू ही तो है
तेरी ही बातें मैंने
हर बार तुझे सुनायी
-तरुण
Posted by
tarun
at
10:28 PM
2
comments
Monday, June 23, 2008
क्या मालूम था
मुस्कुराये थे कि शायद वक्त बदल जाएगा
क्या मालूम था गम ऐसे भी मिल जाएगा
रात भर जागकर कुछ तेरे ख्वाब सजाये थे
क्या मालूम था सुबह हर ख्वाब जल जाएगा
मुस्कानों को छुपाकर रखा था इस दिल में
सोचा न था दिल भी इन्सां सा बदल जाएगा
तू ही आकर सुना दे क्यूँ तू बेवफा हो गयी
मेरी मौत का वक्त शायद कुछ देर टल जाएगा
रोने के बहाने लाखो है कोई हंसने का न मिला
एक आवाज़ देदे दिल से ये बोझ निकल जाएगा
-तरुण
Posted by
tarun
at
12:48 AM
1 comments
Saturday, June 21, 2008
जाने क्यूँ
होठो पे रहती थी एक खामोशी
जाने अब वो कहाँ गयी
कानो में सुनती थी एक सरगोशी
जाने कबसे वो सुनी नही
आँखों में थे कुछ ख्वाब कभी
जाने क्यूँ अब नींद आती नही
रुकता था कभी चलता था कभी
जाने क्यूँ अब यह होता नही
तुम जो मिले बदला हर पल
जाने क्यूँ फासले बस बुझे नही
तुम हो वह मैं हूँ यहाँ
जाने क्यूँ राहें हमारी मिली नही
जाने क्यूँ हम बस मिले नही ॥
-तरुण
Posted by
tarun
at
6:14 PM
2
comments
Friday, June 13, 2008
हर चोट भी नज्म लगती है
खून आए तो ज़ख्म लगती है
वरना हर चोट मूझे नज्म लगती है
- गुलज़ार
खून आए तो ज़ख्म लगती है
वरना हर चोट मूझे नज्म लगती है
तेरा नाम लेकर जी लेता हूँ कुछ पल
वरना ये साँसे भी कुछ कम लगती है
मैं किसको देखकर मुस्कुराऊँ यहाँ
हर एक आँख यहाँ नम लगती है
अब क्या सुनाऊं उन्हें अपनी दास्ताँ
मेरी आह भी उन्हें एक सितम लगती है
कुछ ऐसे बदला है ये रिश्ता तुमसे
तुम्हारी नजदीकियां भी अब गम लगती है
-तरुण
Posted by
tarun
at
1:53 PM
1 comments
Tuesday, June 3, 2008
सिगरेट
सिगरेट सा मैं दिन रात सुलगता हूँ
हर लम्हा निकलता है धुआं
आहिस्ता आहिस्ता मैं जलता हूँ
तुम जो मिले कुछ ऐसे मिले
मिले कभी, कभी मिले नही
कभी मुस्कुराया मैं तेरे आने पे
तेरे जाने पे मैं रोया कभी
तुम साथ थे मगर साथ नही
ऐसे साथ पे मैं तरसा कभी
कभी जला मैं , फिर बुझा कभी
सुलगता रहा एक सिगरेट सा
एक सिगरेट सा मैं जलता रहा
-तरुण
Posted by
tarun
at
12:34 PM
2
comments
लिखूं
तेरे मेरे
इस रिश्ते का
कोई अब अंजाम लिखूं
हर साँस पे
उठते सवालो का
कोई तो जवाब लिखूं
जुदाई के
हर लम्हे का
चलो अब मैं हिसाब लिखूं
तेरे लिए
जो सोची थी कभी
वो हर मैं बात लिखूं
बहुत तरसे है
बहुत तड़पे है
दुनिया के हर ज़ुल्म का
अब एक जवाब लिखूं
-तरुण
Posted by
tarun
at
12:29 PM
2
comments
तेरे पीछे
कभी रात से पूछूं
वो भी न बतलाये
कभी चाँद से कुछ कहूँ
वो भी न कुछ सुनाये
सुबह भी बस
चुप चुप सी आए
शाम भी न जाने क्यों
हर पल शरमाये
फुलो में तेरा रूप छुपा है
कलियाँ भी सब तेरी आस लगाये
बादल बरसे जैसे तेरे लिए
हवा भी कुछ तेरी बातें सुनाये
एक मैं ही नही हूँ तनहा
जो बातें करूँ तेरी जानम
ये सारी दुनियाँ तेरे पीछे
बस तेरे पीछे चली जाए ...
-तरुण
Posted by
tarun
at
6:28 AM
0
comments
तेरी आँखों का ही खेल है सब
तेरी आंखो का ही खेल है सब
वो चुप रहकर भी सब कहती है
मैं घंटो देखता हूँ उनको
वो ऐसे मेरी नजरो में रहती है
तेरी दिल की बातें वो करती है
लेकिन मेरे दिल की भी वो सुनती है
तुम रूठो तो वो खफा हो जाती है
मैं रूठो तो वो भी तरसती है
कभी कभी मेरी आँखे पे भी
वो दुआओं सा प्यार वो बरसाती है
जब मैं तेरी तरफ़ हाथ बढाता हूँ
वो निगाहों से मूझे बाँध लेती है
तेरी आंखो में वो कशिश सी है
जो मेरी ज़िंदगी को खींचे जाती है
मैं कितना भी दूर रहूँ तुझसे
वो मूझे तेरे करीब ले आती है
मैं तेरी आंखो में जब देखता हूँ
सागर सा गहरा एक प्यार मूझे दिखता है
कभी मैं डूब जाता हूँ उसमे
कभी वो मूझे उठकर चूम लेता है
मैं मायूस होता हूँ जब भी कभी
एक उम्मीदों का आसमान मूझे वो दिखाती है
मेरी नाकामियों में भी वो
मूझे एक जीत का एहसास वो दिलाती है
-तरुण
Posted by
tarun
at
5:28 AM
0
comments
Monday, May 5, 2008
तुम मेरी क्या हो
मैं जब तेरा नाम लेता हूँ
एक कविता वो लगती है
मैं जब तुझको बुलाता हूँ
एक दुआ सी सुनती है
तू जब मेरे करीब आती है
मुझे साँसे सी मिलती है
तू जब मुझसे रूठ जाती है
तो मेरी बस जान निकलती है
मैं कैसे कहूँ तुमसे कि
तुम मेरी क्या हो
मेरी ज़िंदगी की हर राह बस
तेरे कदमों से चलती है ...
-तरुण
Posted by
tarun
at
5:05 PM
1 comments
Saturday, April 26, 2008
बहुत बेदर्द है ये दर्द तेरा जीने नही देता
बहुत बेदर्द है ये दर्द तेरा जीने नही देता
मैं मयखाना लिए बैठा हूँ ये पीने नही देता
बहुत कांटे चुभोये है इस ज़िंदगी ने मेरी रूह पर
न जाने जिस्म में कौन मेरे खून को बहने नही देता
आता है कभी कभी रहम बहुत अपने इस दिल पे
भूलता है जब ये तुमको मैं इसे भूलने नही देता
यूं तो कम नही है इस जहाँ में हमसफ़र मेरे
लेकिन ये रास्ता किसी को तुम्हारी जगह लेने नही देता
एक दिन बहुत रोया था मैं तुमको छोड़कर तनहा
न जाने क्यों अब गम भी तुम्हारा मुझे रोने नही देता
-तरुण
Posted by
tarun
at
12:29 AM
1 comments
Friday, April 25, 2008
तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे
तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे
जो वादे किए नही कभी वो निभाऊं भी तो कैसे
भीड़ में यूं लगता है की हर चेहरा मेरा अपना है
लौटकर उस अजनबी से घर में जाऊं भी तो कैसे
कभी पैमाने छलक गए , कभी मयखाना नही मिला
तुझे भुलाने की कोई और दवा अब पाऊँ भी तो कैसे
तनहा ही चला था सफर पे, अकेले ही जाना है
तेरे दो पल के साथ पे ज़िंदगी बिताऊँ भी तो कैसे
है शिकायत इस दिल से, एक गिला ख़ुद से भी है
तेरी उम्मीदों पे बस जिया, अब वो भुलाऊँ भी तो कैसे
तेरी उस मोहब्बत कर क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे ...
-तरुण
Posted by
tarun
at
5:47 PM
1 comments
Thursday, April 24, 2008
और चेहरा बदल गया - एक कहानी
अभी दो ही महीने पुरानी तो बात है, जब वो नेहा के साथ था । दोनों कितने खुश थे । वो दिन रात नेहा के सपने देखता था उसकी ही बातें करता था । उसे ऐसा लगता था की नेहा को उसके लिए ही बनाया गया है ।
सुबह से शाम तक वो दोनों न जाने कितनी बातें करते थे कितनी कसमें खाते थे । ज़िंदगी भर साथ रहेंगे , कभी न जुदा होंगे और न जाने क्या क्या । अनिल तो उसे अपनी आँखों पे बिठाकर रखता था। जब कभी भी नेहा परेशान होती वो उसकी बातें बड़े प्यार से सुनता था, फिर उसे ऐसे समझता था की वो मुस्कुराने लगती थी। वैसे अक्सर नेहा एक ही बात पे परेशान होती थी वो अपने पिताजी के रवैये को लेकर । वो अनिल को पसंद नही करते थे और दिन रात उसे अनिल से न मिलने को कहते रहते थे। नेहा उनकी बातें सुनकर मायूस हो जाती थी फिर वो घर से बाहर निकलकर अनिल को फ़ोन करती थी । अनिल उसे घंटो समझाता था और कहता था की वो सब संभाल लेगा। नेहा उससे बात करके बहुत अच्छा महसूस करती थी । दोनों इन छोटी मोटी उलझनों के बावजूद बहुत खुश थे ।
फिर एक दिन दिन वही हुआ जिसका नेहा को डर था और अनिल भी नही चाहता था की ऐसा कुछ हो । नेहा की मौसी उसके लिए एक रिश्ता लेकर आयी थी । बात जान पहचान में थी इसीलिए सब जल्दी जल्दी हो रहा था । वो एक दो दिन में नेहा को देखने आने वाले थे । नेहा उस दिन बहुत परेशान थी अनिल ने उसे बहुत समझाया लेकिन जब वो नही समझी तो उसने कहा की वो उसके पिता जी से बात करेगा। शाम को उसने ये किया भी लेकिन बात नही हुई, बहस हुई । और नतीजा ये निकला की नेहा के पिताजी ने अनिल को नेहा से दूर रहने की धमकी ही दे डाली । लेकिन अनिल को लग रहा था की उसने बात तो कर ही ली है रात को जब नेहा का फ़ोन आया उसने नेहा को समझाने की कोशिश की । लेकिन नेहा रोती रही । फिर ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा । और एक दिन नेहा का रिश्ता भी तय हो गया । अनिल उस रात बहुत रोया, शायद आँसुओ से वो नेहा का रिश्ता मिटाना चाहता था और उसने ये कर भी दिया । अगली सुबह जब वो उठा, तो वो काफ़ी अच्छा महसूस कर रहा था ऐसा लग रहा था की वो एक नयी दुनिया में आया है ।
उस दिन जब वो ऑफिस गया तो नए मूड में था । कुछ दिनों पहले उनके यह एक नयी लड़की ने ज्वायन किया था आज वो उसके पास जाकर उससे बातें करने लगा । कुछ दिनों में ये बातें दोस्ती में बदल गयी । और फिर एक दिन अनिल ने अंजलि को वो सब कह दिया जो एक बरस पहले उसने नेहा को कहा था । लेकिन अंजलि ने उस दिन उससे कोई बात नही की। वो बस खामोश ही रही । दो दिन बाद अंजलि ने अनिल से बात की , उसके माता पिता काफ़ी दूर एक छोटे से शहर में रहते है । उन्हें शायद ये सब पसंद न आए तो वो अनिल से हर सवाल का जवाब चाहती थी । सवाल शायद जाने पहचाने ही थे । अनिल ने इनका जवाब किसी और को भी दिया था । अनिल ने एक पल नेहा को याद किया और फिर सब कुछ भूल गया । फिर उसने अंजलि से वो सब वादे कर डाले जो उसने कुछ ही दिन पहले तोड थे । अंजलि आज बहुत खुश थी उसे वो सब मिल गया था जो वो चाहती थी और अनिल भी बहुत खुश था उसे भी अंजलि मिल गयी थी ।
और अब जब भी अंजलि कुछ घबराती है , अनिल उसे बड़े प्यार से समझाता है सब कुछ करने की कसमें खाता है। दो महीने में कुछ भी तो नही बदला । सब कुछ वैसे ही चल रहा है । बस एक नाम और एक चेहरा बदल गया है ।
-तरुण
Posted by
tarun
at
5:39 PM
0
comments
Sunday, April 20, 2008
ऐ रात तू ही बता दे
ऐ रात तू ही बता दे , कहाँ छुपा है मेरा चाँद
बरसों हुए आँख मिलाये, बरसों से नही देखा चाँद
जाए तू शहर शहर , गुज़रे तू हर राह से
तुमने तो देखा होगा, किस गली में निकला है मेरा चाँद
चाँद के बिना मैं आधा हूँ , जैसे काली रात अमावस
संदेसा तू दे दे उसको , मुझसे मिला दे मेरा चाँद
हर रात फलक के चाँद से पूछो, जाने क्यों वो भी न बताये
उसने तो देखा होगा , जब खिड़की में निकला होगा मेरा चाँद
-तरुण
Posted by
tarun
at
7:58 PM
3
comments
Tuesday, April 15, 2008
उससे पहले ही
मैं कुछ कहता
उससे पहले ही
उन्होंने सब कह दिया
मैं मुस्कुराता
उससे पहले ही
उन्होंने अपनी आँखों को झुका दिया
मैं उठता उनकी महफिल से
उससे पहले ही
उन्होंने हर शमां को बुझा दिया
कुछ आंसू छलकते आंखो से
उससे पहले ही
उन्होंने अपना दामन छुडा लिया
मैं मरता
उससे पहले ही
वो मुझको छोड़कर चले गए
मैं मरने से पहले ही मर गया ....
मैं मरने से पहले ही मर गया ...
-तरुण
Posted by
tarun
at
12:58 PM
3
comments
Sunday, April 13, 2008
तुझको जब मैं याद करूँ तो
तुझको जब मैं प्यार करूँ तो
ऐसे तुझको प्यार करूँ प्यार मैं
आईने से तू कुछ न पूछे
मेरी आंखो से तू ख़ुद को देखे
तुझको जब मैं याद करूँ तो
ऐसे तुझको याद करूँ मैं
मैं हर पल ख़ुद से पूछूँ
कौन हूँ मैं, क्या नाम है मेरा
तेरा जब मैं नाम लूँ तो
ऐसे तेरा नाम लूँ मैं
साँसे मेरी मुझसे ये पूछे
क्यों हमको ऐसे भुला है तू
अपने दिल से जब मैं बात करूँ तो
बस तेरी आवाज़ यूं आए
धड़कन मेरी खामोश हो सारी
तेरी बस बातें वो सुनाये
तुझको जब मैं प्यार करूँ तो ...
-तरुण
Posted by
tarun
at
11:21 PM
1 comments
Monday, April 7, 2008
मैं जी रहा हूँ
खाली खाली सा घर है मेरा
चुप चुप सी हर आहट है
न सरगोशी है कोई
न ही कोई सरसराहट है
तुम नही
तेरे ख्वाब भी नही
बस टूटी हुई सी एक चाहत है
मैं भी कही नही हूँ
जो हूँ मैं वो नही हूँ
भटकता हूँ मैं एक तलाश में
घर में कहाँ रहता हूँ
अनजाने से रास्तों पे चलता हूँ
कुछ अधूरी सी बातें कहता हूँ
तुम गए
ज़िंदगी गयी
खो गयी सब खुशियाँ मेरी
मैं रहा
साँसे रही
सब खो गयी मुस्कुराह्ते मेरी
ऐसे ही अब एक अधूरी सी
ज़िंदगी मैं जी रहा हूँ
कुछ मोती न छलक जाए आंखो से
इसीलिए
कुछ कतरे मैं हर लम्हा पी रहा हूँ
लेकिन
मैं जी रहा हूँ मैं जी रहा हूँ
-तरुण
Posted by
tarun
at
9:10 PM
1 comments
लकीर
हर सुबह
अपने हाथो की
लकीरों को देखता हूँ
हर सुबह
उन लकीरों मैं
एक नयी लकीर को ढूंढता हूँ
क्या मालूम
मेरी रातो की
दुआओं को सुनकर
खुदा ने मेरे हाथ में
तेरी एक लकीर बना दी हो
-तरुण
Posted by
tarun
at
9:06 PM
0
comments
वो कहते नही
मैं कहता हूँ वो कहते नही, बस आंखो में प्यार छुपाते है
मैं दुनिया को बताता रहता हूँ वो तन्हाइयो में हमे बुलाते है
मैं आसमानों की उंचाइयो पे उसकी उमीदो को सजाता हूँ
वो अपने घर के मन्दिर में, मेरा एक चिराग जलाते है
मैं गुलशन गुलशन घूमता हूँ, मिल जाए कोई कली उस जैसी
वो मेरे पुराने खतो को अपने तकिये के नीचे छुपाते है
एक आदत है जो हर शाम को मैं लौटकर घर जाता हूँ
वरना क्या दीवारों से भी कोई रिश्ते निभाए जाते है
क्यों मेरी कोई कहानी सुने, कोई क्यों मूझे दिलासा दे
जो चाँद से मोहब्बत करते है, वो रातो में आंसू बहाते है
-तरुण
Posted by
tarun
at
8:56 PM
1 comments
जुदाई
पहले जो बातें होठो पे आती थी अक्सर
न जाने क्यों अब सीने में घुटी रहती है
जो आते थे ख्वाब रातो में कभी
न जाने क्यों वो आँखों में सिमटे रहते है
सुबह का सूरज भी न जाने क्यों
एक अजीब से बेचैनी लिए आता है
चाँद भी न जाने क्यों
अब चमकते हुए एक
एहसान सा दिखाता है
बस तुम ही तो गए हो
और तो कुछ भी नही बदला
फिर न जाने क्यों सब कुछ बदल गया है
-तरुण
Posted by
tarun
at
8:51 PM
1 comments

