शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

इंतज़ार

वक़्त से कुछ न कहा मैंने 
वो आया और लौट गया 
रास्तो को भी कहाँ रोका था मैंने
न कितने मुसाफिर आये और चले गये 
दिन निकले और ढल गाए 
रातें भी ख़ामोशी से आयी 
और चुपचाप चली गयी 
चाँद ने भी मुझसे कुछ नहीं कहा 
मुझसे रात भर आँख बचाकर चमकता रहा 
एक तुम क्या गये
दुनिया बदल गयी मेरी 
लेकिन मैं फिर भी उसी जगह खड़ा रहा 
जहाँ तुम मूझे छोड़ गयी थी 
इस इंतज़ार में कि शायद 
कभी किसी बहाने से तुम लौट आओ 

-तरुण 

19 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत खूब .....मन के भाव को सुंदरता के साथ प्रस्तुत किया आपने .

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  2. कभी किसी बहाने से तुम लौट आओ

    bahut khub Tarunji....

    www.poeticprakash.com

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  3. Bahut Khub tarun ji,

    Intzar Milan ki Aash hoti hai,
    Jindagi ki pyas hoti hai,
    Aankhe rahe dekhte dekhte thak jati hai.
    Kyo ki Jindagi me bus intzar hoti hai..

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  4. बहुत बढ़िया |
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    सुनो ऐ सरकार !!

    और इस नए ब्लॉग पे भी आयें और फोलो करें |
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  5. aapne yah kavita parde par bhavna ke sahare utari hai,lekin yahi kavita zindgi ne hakeekat ke sahare mere raste par utari hai,main nahin janta ki kiska dukh bada hai.fir bhi aapke samne apna dukh vaapas leta hoon.ye kamna karta hoon ki aapki zindgi me aisi bas kavitayen hi aayen,hakeekaten nahin.

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  7. जात - पांत न देखता, न ही रिश्तेदारी,
    लिंक नए नित खोजता, लगी यही बीमारी |

    लगी यही बीमारी, चर्चा - मंच सजाता,
    सात-आठ टिप्पणी, आज भी नहिहै पाता |

    पर अच्छे कुछ ब्लॉग, तरसते एक नजर को,
    चलिए इन पर रोज, देखिये स्वयं असर को ||

    आइये शुक्रवार को भी --
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  8. कोमल भाव की रचना !
    न कोई वायदा ,न कोई उम्मीद ,खड़े थे रहगुज़र पर ,
    करना था तेरा इंतज़ार !
    मिशगन हिल्स का यह सौन्दर्य सैन होज़े हमने भी खूब निरखा है .यहाँ से नेवादा तक का सफर बाई रोड .लेक टाहो,गोल्डन गेट ब्रिज, कैसिनो एल्डो राडो (रेनो टाउन ,नेवादा ),रॉबर्ट मंडावी वाइनरी .सब कुछ अपार खज़ाना है सौन्दर्य का .बधाई इस लेखन के लिए .


    बृहस्पतिवार, ८ सितम्बर २०११
    गेस्ट ग़ज़ल : सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही.
    ग़ज़ल
    सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही ,

    साज़ सत्ता की फकत ,एक लम्हे में जाती रही ।

    इस कदर बदतर हुए हालात ,मेरे देश में ,

    लोग अनशन पे ,सियासत ठाठ से सोती रही ।

    एक तरफ मीठी जुबां तो ,दूसरी जानिब यहाँ ,

    सोये सत्याग्रहियों पर,लाठी चली चलती रही ।

    हक़ की बातें बोलना ,अब धरना देना है गुनाह

    ये मुनादी कल सियासी ,कोऊचे में होती रही ।

    हम कहें जो ,है वही सच बाकी बे -बुनियाद है ,

    हुक्मरां के खेमे में , ऐसी खबर आती रही ।

    ख़ास तबकों के लिए हैं खूब सुविधाएं यहाँ ,

    कर्ज़ में डूबी गरीबी अश्क ही पीती रही ,

    चल ,चलें ,'हसरत 'कहीं ऐसे किसी दरबार में ,

    शान ईमां की ,जहां हर हाल में ऊंची रही .

    गज़लकार :सुशील 'हसरत 'नरेलवी ,चण्डीगढ़

    'शबद 'स्तंभ के तेहत अमर उजाला ,९ सितम्बर अंक में प्रकाशित ।

    विशेष :जंग छिड़ चुकी है .एक तरफ देश द्रोही हैं ,दूसरी तरफ देश भक्त .लोग अब चुप नहीं बैठेंगें
    दुष्यंत जी की पंक्तियाँ इस वक्त कितनी मौजू हैं -

    परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,हवा में सनसनी घोले हुए हैं ।
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  9. जाने वालों का बस इन्तेज़ार रहता है .. वो लौट कर नहीं आते ...

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  11. बहुत सुन्दर रचना है।
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  12. इंतजार भी तो सुखद होता है कम से कम आस तो होती है...

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  13. तरुण जी ...बहुत सुन्दर कोमल मूल भाव लिए रचना ...आनंदित कर गयी ..ऐसे ही होता है इंतजार ...काश ये पूरा ...
    भ्रमर ५

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  14. तरुण जी आपकी ये चंद पंक्तियाँ दिल के बहुत करीब लगी...

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  15. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं |
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    धन्यवाद |
    विनीत नागपाल

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  16. सुन्दर भावपूर्ण कविता. दीपोत्सव की शुभकामनायें.

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