बुधवार, 27 फ़रवरी 2008

मेरी मजार पे


मेरी मजार पे एक चिराग जला गया कोई
बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई

आज की रात बहुत बेचैन है कटती ही नही
सुबह का एक ख्वाब इसे दिखा गया कोई

एक तेरे दर्द के बीमार थे हम, मर भी गए
उसकी दवा सारे शहर को पिला गया कोई

अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन
एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई

मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको
तेरी एक तस्वीर फलक पे बना गया कोई

-तरुण

7 टिप्‍पणियां:

  1. मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको
    तेरी एक तस्वीर फलक पे बना गया कोई...

    इस बात में वज़न है... वाह!

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  2. mai ek bimar mar gaya,sare shahr dawa pila gaya koi,hmm bahut badhiya,ab ek sher ki tariff nahi karungi sare bahutsundar bane hai.aafarin

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  3. मेरी मजार पे एक चिराग जला गया कोई
    बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई

    Beautiful creation! Bahut achhi panktiyan hein. Umeedon ka chirag yun hi jalta rahe!

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  4. aapke sabhi kavitayein ek se badhkar ek hai...

    samay ki kami ki vajah se sab me apne comments nahi likh paane ka mujhe afsos hai...lekin appke blog ab mere favourite list mein shaamil ho gaya hai...umeed hai ki aapse aur bhi achhi rachnayein padhne ko milengi

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  5. अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन
    एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई

    bas dil se yahi aawaaz aati hai

    'Ek sach woh tha jo main janta tha ..
    Ek sach yeh hai jo mujhe dikha gaya koi'

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  6. Are bhai kya baat hai . Kya shayari hai ...dil ko chchoo gai. wahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh

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