रविवार, 27 जुलाई 2008

सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा

कल रात सुना है फिर से बम फटे
कल रात सुना है
इन्सां ने फिर इन्सां को कत्ल किया
फिर से बहा लहू सड़क पे
फिर से कितने जिस्मो के टुकड़े
पत्तो से बिखरे
कितने लोग गिरे
न जाने कितने मरे
और एक भीड़ ने फिर से वो मंज़र देखा

दो दिन पहले भी तो
ऐसा ही हुआ था
वो एक भीड़ रुकी थी कुछ पल के लिए
और फिर भूलकर वो खौफनाक लम्हे
सब चल दिए थे अपने अपने सफर पे

फिर होगा ये
शायद बार बार होगा
फिर से बेवजह
किसी और सड़क पे इन्सां का लहू ऐसे ही बहेगा
और ऐसे ही तो चल रहा है न जाने कब से
ये हिंदुस्तान
न जाने कब से यही तो हो रहा है
लोग मरते है सब देखते है
फिर चल देते है जैसे कुछ हुआ ही नही
शायद सोचकर ये की फिर न होगा
और कही ज़हन में वो गीत भी आता है
जो बचपन में सुना था न कितनी बार
कितनी बार जिसे गुनगुनाया भी था
"सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा "
वो विशवास फिर से विशवास जाग उठता है
और फिर से जिंदगी चलने लगती है
अगले किसी ऐसे ही हादसे के लिए
सब तैयार हो जाते है ...........

-तरुण

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक रचना लिखी है।

    वो एक भीड़ रुकी थी कुछ पल के लिए
    और फिर भूलकर वो खौफनाक लम्हे
    सब चल दिए थे अपने अपने सफर पे

    जरुर पढें दिशाएं पर क्लिक करें ।

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  2. ज़िन्दगी इसी का तो नाम है... सारी पीडा और दुखों की बावजूद चलते जाना... हम भारतीयों से बेहतर ये कौन समझेगा... आपकी कविता बहुत अच्ही है. भावना सुंदर और शब्द सटीक है.

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  3. To ab India kab aa rahe ho ? When will your Indian-ness be applied to India?

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