मंगलवार, 22 जुलाई 2008

कल रात

कल रात
फिर वही ख्वाब
मेरी आँखों में आया

कल रात
आसमान का चाँद
मेरे घर की छत पे उतर आया

कल रात
फिर वही बात
चुपके से कही तुमने

कल रात
फिर वही एहसास
महसूस किया मैंने

कल रात
फिर तुम्हारा साथ
कुछ लम्हों को जिया मैंने

कल रात
तुम्हारा हाथ
अपने हाथो में लिया मैंने

कल रात
अपनी हर साँस
फिर तेरे नाम की मैंने

कल रात
छोटी सी मुलाक़ात
फिर एक जिंदगी दे गयी मुझको

आज सुबह
लेकिन वो रात
फिर चुपचाप लौट गयी
मैं फिर से तनहा रह गया
मैं फिर से तनहा रह गया


-तरुण

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ये कविता दर्शाती है एक विरह वेदना में जल रहे इंसान को सुकून देते स्वप्न ... उम्दा लिखते है आप... काश हमारे आपके और सबके स्वप्न किसी हद तक सच हो पाते..

    नीलिमा

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