मंगलवार, 10 मार्च 2009

मुझसे पूछिये

होता है क्या हिज्र-ए-ग़म मुझसे पूछिये
दिल में क्यूँ है ज़ोर-ए-सितम मुझसे पूछिये

दरवाज़े पे खड़े हो मगर दस्तक न कीजिए
इस घर में वो अब रहते है कम मुझसे पूछिये

हाथ क्यूँ बढाता है यूँ अजनबियों की तरफ़
अपनों के लिए कब उठे कदम मुझसे पूछिये

खुदा से क्या कहूँ की वो भी न मेरा हुआ
मेरे पास है बस मेरे ही ग़म मुझसे पूछिये

कबसे खामोश छुपाये बैठा हूँ हर दर्द को मैं
हर आवाज़ पे उठते है ये जख्म मुझसे पूछिये

-तरुण

1 टिप्पणी:

  1. हाथ क्यूँ बढाता है यूँ अजनबियों की तरफ़
    अपनों के लिए कब उठे कदम मुझसे पूछिये

    खुदा से क्या कहूँ की वो भी न मेरा हुआ
    मेरे पास है बस मेरे ही ग़म मुझसे पूछिये

    waah bahut hi badhiya,badhai

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