शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008

तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे

तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे
जो वादे किए नही कभी वो निभाऊं भी तो कैसे

भीड़ में यूं लगता है की हर चेहरा मेरा अपना है
लौटकर उस अजनबी से घर में जाऊं भी तो कैसे

कभी पैमाने छलक गए , कभी मयखाना नही मिला
तुझे भुलाने की कोई और दवा अब पाऊँ भी तो कैसे

तनहा ही चला था सफर पे, अकेले ही जाना है
तेरे दो पल के साथ पे ज़िंदगी बिताऊँ भी तो कैसे है

शिकायत इस दिल से, एक गिला ख़ुद से भी है
तेरी उम्मीदों पे बस जिया, अब वो भुलाऊँ भी तो कैसे

तेरी उस मोहब्बत कर क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे ...

-तरुण

1 टिप्पणी:

  1. तनहा ही चला था सफर पे, अकेले ही जाना है
    तेरे दो पल के साथ पे ज़िंदगी बिताऊँ भी तो कैसे

    wah wah! bahut khub likha hai!

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