सोमवार, 7 अप्रैल 2008

मैं जी रहा हूँ

खाली खाली सा घर है मेरा
चुप चुप सी हर आहट है
न सरगोशी है कोई
न ही कोई सरसराहट है
तुम नही
तेरे ख्वाब भी नही
बस टूटी हुई सी एक चाहत है

मैं भी कही नही हूँ
जो हूँ मैं वो नही हूँ
भटकता हूँ मैं एक तलाश में
घर में कहाँ रहता हूँ
अनजाने से रास्तों पे चलता हूँ
कुछ अधूरी सी बातें कहता हूँ

तुम गए
ज़िंदगी गयी
खो गयी सब खुशियाँ मेरी
मैं रहा
साँसे रही
सब खो गयी मुस्कुराह्ते मेरी

ऐसे ही अब एक अधूरी सी
ज़िंदगी मैं जी रहा हूँ
कुछ मोती न छलक जाए आंखो से
इसीलिए
कुछ कतरे मैं हर लम्हा पी रहा हूँ
लेकिन
मैं जी रहा हूँ मैं जी रहा हूँ


-तरुण

1 टिप्पणी:

  1. इस उम्र की बड़ी सहज सी अभिव्यक्तियाँ और रोमानियत ! बहुत खूब !
    अभिव्यक्ति इतनी सरल और सहज हो पा रही है तो मन कितना सरल होगा !

    लिखते रहिये ।
    bakalamkhud.blogspot.com
    sandoftheeye.blogspot.com

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