बुधवार, 5 मार्च 2008

वो भी क्या दिन थे


वो भी क्या दिन थे , जब आसमानों में परियाँ रहती थी
चाँद ज़मीं पे उतरता था जब दादी माँ कहानियाँ कहती थी

जब नादाँ पंछियों से हम दिन भर चहकते रहते थे
कभी टीचर गुस्सा करती थी, कभी मोहल्ले की शिकायत रहती थी

जब सुबह का सूरज आकर चुपके से हमे जगाता था
रात को जब डैडी कहानी सुनाते थे और माँ सोने को कहती थी

जब छोटी छोटी किताबो में बड़ी बड़ी तस्वीरे होती थी
कभी बादल आँखे दिखाते है कभी नदियाँ आँगन में बहती थी

जब एक झूठे रोने पे सब घंटो मनाते रहते थे
कभी नए खिलोने आते थे कभी ढेरों मिठाईयां मिलती थी

-तरुण

8 टिप्‍पणियां:

  1. तरुन बहुत अच्छी रेखा खीची हे बचपन की धन्यवाद

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  2. मुझको यकीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
    जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद में परियां रहती थीं

    एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
    एक वो दिन जब पेड़ की शाखें बोझ हमारा सहती थीं

    एक ये दिन जब सारी सड़कें रुठी रुठी लगती हैं
    एक वो दिन जब आओ खेलें सारी गलियां कहती थीं

    एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
    एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

    एक ये दिन जब लाखों गम और काल पड़ा है आँसू का
    एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं

    मुझको यकीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
    जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद में परियां रहती थीं

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  3. बचपन के दिन भी क्या दिन थे।

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  4. jhuta rona sab ka manana bachpan ka mausam suhana awesome.

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  5. चाँद ज़मीं पे उतरता था जब दादी माँ कहानियाँ कहती थी :-(

    Loves this line...Missing my dadima. Two yrs back She left me.

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