रविवार, 2 मार्च 2008

जाने क्यों ये जाता ही नही

एक साया मेरे साथ है जाने क्यों ये जाता ही नही
तन्हाई का जो वादा है जाने क्यों ये निभाता ही नही

आंखो से छलकते थे मोती, जब याद मुझे वो आते थे
अब उनकी यादों को , जाने क्यों मैं बुलाता ही नही

मेरी बेवफाई के किस्से हर रात वो सबसे कहता है
अपनी कसमें आज भी , जाने क्यों वो निभाता ही नही

कभी खुशी कभी है ग़म, ज़िंदगी की ये रीत है
खुशी आयी मगर, ये ग़म है कि बस जाता ही नही

अब मयकदें में भी हमको मिलती नही शराब
उसका नाम जो लिया, साकी भी अब पिलाता ही नही

-तरुण

2 टिप्‍पणियां:

  1. अब मयकदें में भी हमको मिलती नही शराब
    उसका नाम जो लिया, साकी भी अब पिलाता ही नही

    Hmmm....Bahut sunder. hui bahut hi mahngi sharab......:-)

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  2. आंखो से छलकते थे मोती, जब याद मुझे वो आते थे
    अब उनकी यादों को , जाने क्यों मैं बुलाता ही नही


    behtarin,wo saya hamesha saath hi rehta hai,tanhai ka vada nahi nibhata,sundar.

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