बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

एक बार मुझको सो जाने दो

न कोई बात तुम कहो
न कोई गीत आज गुनगुनाओ
दिल की कोई बात जुबान तक न आने दो
ये जो खामोशी है तन्हाई है
आज इसे बस चुप ही रहने दो
न जाने कब से आँखों में नींद लिए मैं चल रहा हूँ
न जाने कब से जिस्म मेरा टूट रहा है
आज बस मुझको सो जाने दो
वो ख्वाब जो कब से राह देख रहे है
एक बार उन्हें आँखों में आ जाने दो
बहुत थक गया हूँ मैं
अब हर शिकन को भूल जाने दो
एक बार मुझको सो जाने दो

1 टिप्पणी:

  1. वो ख्वाब जो कब से राह देख रहे है
    एक बार उन्हें आँखों में आ जाने दो
    बहुत थक गया हूँ मैं
    अब हर शिकन को भूल जाने दो
    एक बार मुझको सो जाने दो

    बहुत बढिया!

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