रविवार, 28 सितंबर 2008

मंजिल

बहुत रोका था मेरी माँ ने
जब घर से निकला था
उसके आँसूओ ने तो
अब तलक पीछा नही छोड़ा
फिर भी न जाने कौन सी
मंजिल मुझे पानी थी
न माँ को देखा
न उसके आँसू ही पोछे कभी
और आज
जब अपने घर से बहुत दूर
बैठा हूँ तनहा
तो सोचता हूँ
क्या ये ही मंजिल थी मेरी
जिसके लिए मैं इतना भागा था
इस दौड़ मैं इतना खो जाता था अक्सर
कि आईने से
अपना नाम पूछता था मैं
ये मंजिल जो कभी
बहुत हसीं लगती थी मुझको
आज बहुत बेमानी नज़र आती है
और अब अक्सर बैठकर तन्हाईयो में
मैं इंतज़ार करता हूँ
कि एक बार कोई बुला ले
मुझको वापिस
बस एक आवाज़ देदे
और मैं लौट जाऊं
मैं वापिस घर लौट जाऊं

-तरुण

2 टिप्‍पणियां:

  1. Bhai Jaan wapas laut aao ,
    mein de raha hoon na tumhe aawaz.
    Come home as early as possible.

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  2. apno k paas lautne ki koi wajah ya, bulave ki jarurat kahan hoti hai? Jab dil kare laut chalo, bus ye mat socho ki lautne k baad kya hoga?

    I don't understand how do u write such a good n simple poem. Its really nice.

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