मंगलवार, 16 सितंबर 2008

रस्म

अभी ख्वाब कुछ जगे न थे
कि सुबह ने उठा दिया
अभी फूल कुछ खिले न थे
कि रात ने सुला दिया
अभी कदम कुछ मिले न था
कि फासला बढा दिया
अभी जुबां कुछ मिली न थी
कि सवालों को उठा दिया
अभी रास्तो पे चले न थे
कि मंजिलो को भुला दिया
अभी एक पल भी मुस्कुराये न थे
कि अश्को को बहा दिया
अभी कसमे कोई खाई न थी
कि हर एक वादे को भुला दिया
अभी नाम भी जुड़ा न था
कि हर रिश्ता तुमने मिटा दिया
एक बार मिलने से पहले ही
बिछड़ने कि हर रस्म को निभा दिया

-तरुण

1 टिप्पणी:

  1. ...... अति सुंदर ह्रदय स्पर्शी कविता...... अंतर्मन की गहराइयों में उतर आया.... एक -एक शब्द बेसुधगी सी पैदा करने को काफी है...... आपके नये पोस्ट की बेसब्री से प्रतीक्षा में....

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