सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

मुश्किल है

हर बार तेरे दर से खाली लौट आना मुश्किल है
तुझसे नज़रे मिलाकर फिर झुकाना मुश्किल है

तेरी आँखों में न जाने कितने चाँद मैंने देखे है
तेरे बिना अब यूँ तनहा राते बिताना मुश्किल है

तुम कहो तो हर एक साँस अपनी छोड़ आऊं मैं
तेरी यादो को लेकिन अब भूल पाना मुश्किल है

तेरे चेहरे ने कितनी बार मेरी सुबह सजाई है
बिन तेरे रातो को कोई ख्वाब बनाना मुश्किल है

तेरा हाथ छूने से मुझे एक रूह मिल गयी थी
तेरे उस एहसास से ख़ुद को भुलाना मुश्किल है

-तरुण

4 टिप्‍पणियां:

  1. तेरे चेहरे ने कितनी बार मेरी सुबह सजाई है
    बिन तेरे रातो को कोई ख्वाब बनाना मुश्किल है...........

    बहुत सुंदर।

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  2. woh kisi ka apne dard ko shabdo mein utaarna..
    woh kisi ka us par wah wah keh jana..

    I don't have words..but still..
    I am touched...

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  3. Hello Tarun,

    As usual you have written it nicely :)
    The verbiage that you have used has actually touched my heart. Good job done !!

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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