बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

अब मुझको सो जाने दो

अपने पहलू में आज मुझे छुप जाने दो
बहुत थक गया हूँ अब मुझे सो जाने दो

तुम भी चले आओ मयखाने में आज की रात
आज की रात को मयखाने में डूब जाने दो

जब तेरे बारे में लिखता हूँ तो कुछ सूझता नही
तुम अपने तस्वीर को कागज़ को उतर जाने दो

तेरी आँखों से मैंने मोहब्बत का चलन सिखा है
तुम इन आँखों को अब मुझको न नज़र आने दो

क्या लेकर आया था जब तुम मिले थे मुझको
उस प्यार को फिर फिजाओ में बिखर जाने दो

बहुत थक गया हूँ अब मुझको सो जाने दो ...
-तरुण

2 टिप्‍पणियां:

  1. सो जाने दो... बहुत ही सुंदर कविता है, मुझे तो ऐसा लगा जैसे मैं दुष्यंत कुमार की कोई कविता पढ़ रही हूँ. सच्ची में भावः प्रवीण रचना है.

    नीलिमा

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