शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

अपने घर की दीवारों को आईना तेरा बनाया है

एक तेरे भरोसे पर अपनी सांसो को टिकाया है
तेरी उम्मीदों की तपिश में हर पल को जलाया है

तेरी यादो में आजकल मैं खोया हूँ कुछ ऐसे
अपने घर की दीवारों को आईना तेरा बनाया है

मैं तुझसे अपना हाल-ऐ-दिल कैसे कह दूँ
तुमने मेरी बातो पे कब कोई आंसू बहाया है

तुमने तोडा है हर रिश्ता मैं फिर न कुछ बोला
कुछ ऐसे मैंने तुझसे अपना हर वादा निभाया है

क्या लेकर मैं आया था जो रोऊँ मैं तबाह होकर
जो लिया था यहीं से वो यहीं पे तो लुटाया है

-तरुण

8 टिप्‍पणियां:

  1. this writing gives an impression of Dushyant kumar... very nice.

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  2. तेरी यादो में आजकल कुछ खोया हूँ मैं कुछ ऐसे
    अपने घर की दीवारों को आईना तेरा बनाया है

    बहुत खूब। अच्छा लगा पढकर।

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  3. its beautiful.
    may be I am wrong but it seems to be very true.
    keep writing.

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  4. bahut achha likha hai aapne...

    "तुमने तोडा है हर रिश्ता मैं फिर न कुछ बोला
    कुछ ऐसे मैंने तुझसे ऐसे हर वादा निभाया है

    क्या लेकर मैं आया था जो रोऊँ मैं तबाह होकर
    जो लिया था यहीं से वो यहीं पे तो लुटाया है"

    :))

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  5. बहुत सुंदर...बहुत अच्‍छा लगा पढकर।

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  6. ख्याल बहुत सुन्दर है और निभाया भी है आपने ,सुंदर शब्दों का चयन
    बहुत बहुत शुभकामनाएं ।


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