शुक्रवार, 26 जून 2009

एक बार

अपनी ज़िन्दगी को छोड़कर
अपनी हर खुशी को छोड़कर
जो बैठे है
बस एक तेरा नाम लेकर
एक बार
उनकी तरफ़ भी
आंखे उठाकर
मुस्कुराकर देख लो

देखना फिर
न जाने कितनी
आंखे जगमगाती है
न जाने कितने चेहरे खिल जाते है
और न जाने कितनी जिन्दगियाँ संवर जाती है


-तरुण

5 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे आपकी रचना बहुत पसंद आई

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  2. aaj itne dino baad aapka post dekh kar bahut achha laga..
    welcome back

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  3. Hi
    Long time... Nice to find some great stuff from you (like always).
    The beauty is less words and nice meaning.
    Keep writing!

    Rgds,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com/

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  4. आपकी कविता अच्छी लगी
    शुक्रिया

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