मैं जब तेरा नाम लेता हूँ
एक कविता वो लगती है
मैं जब तुझको बुलाता हूँ
एक दुआ सी सुनती है
तू जब मेरे करीब आती है
मुझे साँसे सी मिलती है
तू जब मुझसे रूठ जाती है
तो मेरी बस जान निकलती है
मैं कैसे कहूँ तुमसे कि
तुम मेरी क्या हो
मेरी ज़िंदगी की हर राह बस
तेरे कदमों से चलती है ...
-तरुण
सोमवार, 5 मई 2008
शनिवार, 26 अप्रैल 2008
बहुत बेदर्द है ये दर्द तेरा जीने नही देता
बहुत बेदर्द है ये दर्द तेरा जीने नही देता
मैं मयखाना लिए बैठा हूँ ये पीने नही देता
बहुत कांटे चुभोये है इस ज़िंदगी ने मेरी रूह पर
न जाने जिस्म में कौन मेरे खून को बहने नही देता
आता है कभी कभी रहम बहुत अपने इस दिल पे
भूलता है जब ये तुमको मैं इसे भूलने नही देता
यूं तो कम नही है इस जहाँ में हमसफ़र मेरे
लेकिन ये रास्ता किसी को तुम्हारी जगह लेने नही देता
एक दिन बहुत रोया था मैं तुमको छोड़कर तनहा
न जाने क्यों अब गम भी तुम्हारा मुझे रोने नही देता
-तरुण
मैं मयखाना लिए बैठा हूँ ये पीने नही देता
बहुत कांटे चुभोये है इस ज़िंदगी ने मेरी रूह पर
न जाने जिस्म में कौन मेरे खून को बहने नही देता
आता है कभी कभी रहम बहुत अपने इस दिल पे
भूलता है जब ये तुमको मैं इसे भूलने नही देता
यूं तो कम नही है इस जहाँ में हमसफ़र मेरे
लेकिन ये रास्ता किसी को तुम्हारी जगह लेने नही देता
एक दिन बहुत रोया था मैं तुमको छोड़कर तनहा
न जाने क्यों अब गम भी तुम्हारा मुझे रोने नही देता
-तरुण
शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008
तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे
तेरी उस मोहब्बत का क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे
जो वादे किए नही कभी वो निभाऊं भी तो कैसे
भीड़ में यूं लगता है की हर चेहरा मेरा अपना है
लौटकर उस अजनबी से घर में जाऊं भी तो कैसे
कभी पैमाने छलक गए , कभी मयखाना नही मिला
तुझे भुलाने की कोई और दवा अब पाऊँ भी तो कैसे
तनहा ही चला था सफर पे, अकेले ही जाना है
तेरे दो पल के साथ पे ज़िंदगी बिताऊँ भी तो कैसे है
शिकायत इस दिल से, एक गिला ख़ुद से भी है
तेरी उम्मीदों पे बस जिया, अब वो भुलाऊँ भी तो कैसे
तेरी उस मोहब्बत कर क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे ...
-तरुण
जो वादे किए नही कभी वो निभाऊं भी तो कैसे
भीड़ में यूं लगता है की हर चेहरा मेरा अपना है
लौटकर उस अजनबी से घर में जाऊं भी तो कैसे
कभी पैमाने छलक गए , कभी मयखाना नही मिला
तुझे भुलाने की कोई और दवा अब पाऊँ भी तो कैसे
तनहा ही चला था सफर पे, अकेले ही जाना है
तेरे दो पल के साथ पे ज़िंदगी बिताऊँ भी तो कैसे है
शिकायत इस दिल से, एक गिला ख़ुद से भी है
तेरी उम्मीदों पे बस जिया, अब वो भुलाऊँ भी तो कैसे
तेरी उस मोहब्बत कर क़र्ज़ लौटाऊँ भी तो कैसे ...
-तरुण
गुरुवार, 24 अप्रैल 2008
और चेहरा बदल गया - एक कहानी
अभी दो ही महीने पुरानी तो बात है, जब वो नेहा के साथ था । दोनों कितने खुश थे । वो दिन रात नेहा के सपने देखता था उसकी ही बातें करता था । उसे ऐसा लगता था की नेहा को उसके लिए ही बनाया गया है ।
सुबह से शाम तक वो दोनों न जाने कितनी बातें करते थे कितनी कसमें खाते थे । ज़िंदगी भर साथ रहेंगे , कभी न जुदा होंगे और न जाने क्या क्या । अनिल तो उसे अपनी आँखों पे बिठाकर रखता था। जब कभी भी नेहा परेशान होती वो उसकी बातें बड़े प्यार से सुनता था, फिर उसे ऐसे समझता था की वो मुस्कुराने लगती थी। वैसे अक्सर नेहा एक ही बात पे परेशान होती थी वो अपने पिताजी के रवैये को लेकर । वो अनिल को पसंद नही करते थे और दिन रात उसे अनिल से न मिलने को कहते रहते थे। नेहा उनकी बातें सुनकर मायूस हो जाती थी फिर वो घर से बाहर निकलकर अनिल को फ़ोन करती थी । अनिल उसे घंटो समझाता था और कहता था की वो सब संभाल लेगा। नेहा उससे बात करके बहुत अच्छा महसूस करती थी । दोनों इन छोटी मोटी उलझनों के बावजूद बहुत खुश थे ।
फिर एक दिन दिन वही हुआ जिसका नेहा को डर था और अनिल भी नही चाहता था की ऐसा कुछ हो । नेहा की मौसी उसके लिए एक रिश्ता लेकर आयी थी । बात जान पहचान में थी इसीलिए सब जल्दी जल्दी हो रहा था । वो एक दो दिन में नेहा को देखने आने वाले थे । नेहा उस दिन बहुत परेशान थी अनिल ने उसे बहुत समझाया लेकिन जब वो नही समझी तो उसने कहा की वो उसके पिता जी से बात करेगा। शाम को उसने ये किया भी लेकिन बात नही हुई, बहस हुई । और नतीजा ये निकला की नेहा के पिताजी ने अनिल को नेहा से दूर रहने की धमकी ही दे डाली । लेकिन अनिल को लग रहा था की उसने बात तो कर ही ली है रात को जब नेहा का फ़ोन आया उसने नेहा को समझाने की कोशिश की । लेकिन नेहा रोती रही । फिर ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा । और एक दिन नेहा का रिश्ता भी तय हो गया । अनिल उस रात बहुत रोया, शायद आँसुओ से वो नेहा का रिश्ता मिटाना चाहता था और उसने ये कर भी दिया । अगली सुबह जब वो उठा, तो वो काफ़ी अच्छा महसूस कर रहा था ऐसा लग रहा था की वो एक नयी दुनिया में आया है ।
उस दिन जब वो ऑफिस गया तो नए मूड में था । कुछ दिनों पहले उनके यह एक नयी लड़की ने ज्वायन किया था आज वो उसके पास जाकर उससे बातें करने लगा । कुछ दिनों में ये बातें दोस्ती में बदल गयी । और फिर एक दिन अनिल ने अंजलि को वो सब कह दिया जो एक बरस पहले उसने नेहा को कहा था । लेकिन अंजलि ने उस दिन उससे कोई बात नही की। वो बस खामोश ही रही । दो दिन बाद अंजलि ने अनिल से बात की , उसके माता पिता काफ़ी दूर एक छोटे से शहर में रहते है । उन्हें शायद ये सब पसंद न आए तो वो अनिल से हर सवाल का जवाब चाहती थी । सवाल शायद जाने पहचाने ही थे । अनिल ने इनका जवाब किसी और को भी दिया था । अनिल ने एक पल नेहा को याद किया और फिर सब कुछ भूल गया । फिर उसने अंजलि से वो सब वादे कर डाले जो उसने कुछ ही दिन पहले तोड थे । अंजलि आज बहुत खुश थी उसे वो सब मिल गया था जो वो चाहती थी और अनिल भी बहुत खुश था उसे भी अंजलि मिल गयी थी ।
और अब जब भी अंजलि कुछ घबराती है , अनिल उसे बड़े प्यार से समझाता है सब कुछ करने की कसमें खाता है। दो महीने में कुछ भी तो नही बदला । सब कुछ वैसे ही चल रहा है । बस एक नाम और एक चेहरा बदल गया है ।
-तरुण
सुबह से शाम तक वो दोनों न जाने कितनी बातें करते थे कितनी कसमें खाते थे । ज़िंदगी भर साथ रहेंगे , कभी न जुदा होंगे और न जाने क्या क्या । अनिल तो उसे अपनी आँखों पे बिठाकर रखता था। जब कभी भी नेहा परेशान होती वो उसकी बातें बड़े प्यार से सुनता था, फिर उसे ऐसे समझता था की वो मुस्कुराने लगती थी। वैसे अक्सर नेहा एक ही बात पे परेशान होती थी वो अपने पिताजी के रवैये को लेकर । वो अनिल को पसंद नही करते थे और दिन रात उसे अनिल से न मिलने को कहते रहते थे। नेहा उनकी बातें सुनकर मायूस हो जाती थी फिर वो घर से बाहर निकलकर अनिल को फ़ोन करती थी । अनिल उसे घंटो समझाता था और कहता था की वो सब संभाल लेगा। नेहा उससे बात करके बहुत अच्छा महसूस करती थी । दोनों इन छोटी मोटी उलझनों के बावजूद बहुत खुश थे ।
फिर एक दिन दिन वही हुआ जिसका नेहा को डर था और अनिल भी नही चाहता था की ऐसा कुछ हो । नेहा की मौसी उसके लिए एक रिश्ता लेकर आयी थी । बात जान पहचान में थी इसीलिए सब जल्दी जल्दी हो रहा था । वो एक दो दिन में नेहा को देखने आने वाले थे । नेहा उस दिन बहुत परेशान थी अनिल ने उसे बहुत समझाया लेकिन जब वो नही समझी तो उसने कहा की वो उसके पिता जी से बात करेगा। शाम को उसने ये किया भी लेकिन बात नही हुई, बहस हुई । और नतीजा ये निकला की नेहा के पिताजी ने अनिल को नेहा से दूर रहने की धमकी ही दे डाली । लेकिन अनिल को लग रहा था की उसने बात तो कर ही ली है रात को जब नेहा का फ़ोन आया उसने नेहा को समझाने की कोशिश की । लेकिन नेहा रोती रही । फिर ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा । और एक दिन नेहा का रिश्ता भी तय हो गया । अनिल उस रात बहुत रोया, शायद आँसुओ से वो नेहा का रिश्ता मिटाना चाहता था और उसने ये कर भी दिया । अगली सुबह जब वो उठा, तो वो काफ़ी अच्छा महसूस कर रहा था ऐसा लग रहा था की वो एक नयी दुनिया में आया है ।
उस दिन जब वो ऑफिस गया तो नए मूड में था । कुछ दिनों पहले उनके यह एक नयी लड़की ने ज्वायन किया था आज वो उसके पास जाकर उससे बातें करने लगा । कुछ दिनों में ये बातें दोस्ती में बदल गयी । और फिर एक दिन अनिल ने अंजलि को वो सब कह दिया जो एक बरस पहले उसने नेहा को कहा था । लेकिन अंजलि ने उस दिन उससे कोई बात नही की। वो बस खामोश ही रही । दो दिन बाद अंजलि ने अनिल से बात की , उसके माता पिता काफ़ी दूर एक छोटे से शहर में रहते है । उन्हें शायद ये सब पसंद न आए तो वो अनिल से हर सवाल का जवाब चाहती थी । सवाल शायद जाने पहचाने ही थे । अनिल ने इनका जवाब किसी और को भी दिया था । अनिल ने एक पल नेहा को याद किया और फिर सब कुछ भूल गया । फिर उसने अंजलि से वो सब वादे कर डाले जो उसने कुछ ही दिन पहले तोड थे । अंजलि आज बहुत खुश थी उसे वो सब मिल गया था जो वो चाहती थी और अनिल भी बहुत खुश था उसे भी अंजलि मिल गयी थी ।
और अब जब भी अंजलि कुछ घबराती है , अनिल उसे बड़े प्यार से समझाता है सब कुछ करने की कसमें खाता है। दो महीने में कुछ भी तो नही बदला । सब कुछ वैसे ही चल रहा है । बस एक नाम और एक चेहरा बदल गया है ।
-तरुण
रविवार, 20 अप्रैल 2008
ऐ रात तू ही बता दे
ऐ रात तू ही बता दे , कहाँ छुपा है मेरा चाँद
बरसों हुए आँख मिलाये, बरसों से नही देखा चाँद
जाए तू शहर शहर , गुज़रे तू हर राह से
तुमने तो देखा होगा, किस गली में निकला है मेरा चाँद
चाँद के बिना मैं आधा हूँ , जैसे काली रात अमावस
संदेसा तू दे दे उसको , मुझसे मिला दे मेरा चाँद
हर रात फलक के चाँद से पूछो, जाने क्यों वो भी न बताये
उसने तो देखा होगा , जब खिड़की में निकला होगा मेरा चाँद
-तरुण
बरसों हुए आँख मिलाये, बरसों से नही देखा चाँद
जाए तू शहर शहर , गुज़रे तू हर राह से
तुमने तो देखा होगा, किस गली में निकला है मेरा चाँद
चाँद के बिना मैं आधा हूँ , जैसे काली रात अमावस
संदेसा तू दे दे उसको , मुझसे मिला दे मेरा चाँद
हर रात फलक के चाँद से पूछो, जाने क्यों वो भी न बताये
उसने तो देखा होगा , जब खिड़की में निकला होगा मेरा चाँद
-तरुण
मंगलवार, 15 अप्रैल 2008
उससे पहले ही
मैं कुछ कहता
उससे पहले ही
उन्होंने सब कह दिया
मैं मुस्कुराता
उससे पहले ही
उन्होंने अपनी आँखों को झुका दिया
मैं उठता उनकी महफिल से
उससे पहले ही
उन्होंने हर शमां को बुझा दिया
कुछ आंसू छलकते आंखो से
उससे पहले ही
उन्होंने अपना दामन छुडा लिया
मैं मरता
उससे पहले ही
वो मुझको छोड़कर चले गए
मैं मरने से पहले ही मर गया ....
मैं मरने से पहले ही मर गया ...
-तरुण
उससे पहले ही
उन्होंने सब कह दिया
मैं मुस्कुराता
उससे पहले ही
उन्होंने अपनी आँखों को झुका दिया
मैं उठता उनकी महफिल से
उससे पहले ही
उन्होंने हर शमां को बुझा दिया
कुछ आंसू छलकते आंखो से
उससे पहले ही
उन्होंने अपना दामन छुडा लिया
मैं मरता
उससे पहले ही
वो मुझको छोड़कर चले गए
मैं मरने से पहले ही मर गया ....
मैं मरने से पहले ही मर गया ...
-तरुण
रविवार, 13 अप्रैल 2008
तुझको जब मैं याद करूँ तो
तुझको जब मैं प्यार करूँ तो
ऐसे तुझको प्यार करूँ प्यार मैं
आईने से तू कुछ न पूछे
मेरी आंखो से तू ख़ुद को देखे
तुझको जब मैं याद करूँ तो
ऐसे तुझको याद करूँ मैं
मैं हर पल ख़ुद से पूछूँ
कौन हूँ मैं, क्या नाम है मेरा
तेरा जब मैं नाम लूँ तो
ऐसे तेरा नाम लूँ मैं
साँसे मेरी मुझसे ये पूछे
क्यों हमको ऐसे भुला है तू
अपने दिल से जब मैं बात करूँ तो
बस तेरी आवाज़ यूं आए
धड़कन मेरी खामोश हो सारी
तेरी बस बातें वो सुनाये
तुझको जब मैं प्यार करूँ तो ...
-तरुण
ऐसे तुझको प्यार करूँ प्यार मैं
आईने से तू कुछ न पूछे
मेरी आंखो से तू ख़ुद को देखे
तुझको जब मैं याद करूँ तो
ऐसे तुझको याद करूँ मैं
मैं हर पल ख़ुद से पूछूँ
कौन हूँ मैं, क्या नाम है मेरा
तेरा जब मैं नाम लूँ तो
ऐसे तेरा नाम लूँ मैं
साँसे मेरी मुझसे ये पूछे
क्यों हमको ऐसे भुला है तू
अपने दिल से जब मैं बात करूँ तो
बस तेरी आवाज़ यूं आए
धड़कन मेरी खामोश हो सारी
तेरी बस बातें वो सुनाये
तुझको जब मैं प्यार करूँ तो ...
-तरुण
सोमवार, 7 अप्रैल 2008
मैं जी रहा हूँ
खाली खाली सा घर है मेरा
चुप चुप सी हर आहट है
न सरगोशी है कोई
न ही कोई सरसराहट है
तुम नही
तेरे ख्वाब भी नही
बस टूटी हुई सी एक चाहत है
मैं भी कही नही हूँ
जो हूँ मैं वो नही हूँ
भटकता हूँ मैं एक तलाश में
घर में कहाँ रहता हूँ
अनजाने से रास्तों पे चलता हूँ
कुछ अधूरी सी बातें कहता हूँ
तुम गए
ज़िंदगी गयी
खो गयी सब खुशियाँ मेरी
मैं रहा
साँसे रही
सब खो गयी मुस्कुराह्ते मेरी
ऐसे ही अब एक अधूरी सी
ज़िंदगी मैं जी रहा हूँ
कुछ मोती न छलक जाए आंखो से
इसीलिए
कुछ कतरे मैं हर लम्हा पी रहा हूँ
लेकिन
मैं जी रहा हूँ मैं जी रहा हूँ
-तरुण
चुप चुप सी हर आहट है
न सरगोशी है कोई
न ही कोई सरसराहट है
तुम नही
तेरे ख्वाब भी नही
बस टूटी हुई सी एक चाहत है
मैं भी कही नही हूँ
जो हूँ मैं वो नही हूँ
भटकता हूँ मैं एक तलाश में
घर में कहाँ रहता हूँ
अनजाने से रास्तों पे चलता हूँ
कुछ अधूरी सी बातें कहता हूँ
तुम गए
ज़िंदगी गयी
खो गयी सब खुशियाँ मेरी
मैं रहा
साँसे रही
सब खो गयी मुस्कुराह्ते मेरी
ऐसे ही अब एक अधूरी सी
ज़िंदगी मैं जी रहा हूँ
कुछ मोती न छलक जाए आंखो से
इसीलिए
कुछ कतरे मैं हर लम्हा पी रहा हूँ
लेकिन
मैं जी रहा हूँ मैं जी रहा हूँ
-तरुण
लकीर
हर सुबह
अपने हाथो की
लकीरों को देखता हूँ
हर सुबह
उन लकीरों मैं
एक नयी लकीर को ढूंढता हूँ
क्या मालूम
मेरी रातो की
दुआओं को सुनकर
खुदा ने मेरे हाथ में
तेरी एक लकीर बना दी हो
-तरुण
अपने हाथो की
लकीरों को देखता हूँ
हर सुबह
उन लकीरों मैं
एक नयी लकीर को ढूंढता हूँ
क्या मालूम
मेरी रातो की
दुआओं को सुनकर
खुदा ने मेरे हाथ में
तेरी एक लकीर बना दी हो
-तरुण
वो कहते नही
मैं कहता हूँ वो कहते नही, बस आंखो में प्यार छुपाते है
मैं दुनिया को बताता रहता हूँ वो तन्हाइयो में हमे बुलाते है
मैं आसमानों की उंचाइयो पे उसकी उमीदो को सजाता हूँ
वो अपने घर के मन्दिर में, मेरा एक चिराग जलाते है
मैं गुलशन गुलशन घूमता हूँ, मिल जाए कोई कली उस जैसी
वो मेरे पुराने खतो को अपने तकिये के नीचे छुपाते है
एक आदत है जो हर शाम को मैं लौटकर घर जाता हूँ
वरना क्या दीवारों से भी कोई रिश्ते निभाए जाते है
क्यों मेरी कोई कहानी सुने, कोई क्यों मूझे दिलासा दे
जो चाँद से मोहब्बत करते है, वो रातो में आंसू बहाते है
-तरुण
मैं दुनिया को बताता रहता हूँ वो तन्हाइयो में हमे बुलाते है
मैं आसमानों की उंचाइयो पे उसकी उमीदो को सजाता हूँ
वो अपने घर के मन्दिर में, मेरा एक चिराग जलाते है
मैं गुलशन गुलशन घूमता हूँ, मिल जाए कोई कली उस जैसी
वो मेरे पुराने खतो को अपने तकिये के नीचे छुपाते है
एक आदत है जो हर शाम को मैं लौटकर घर जाता हूँ
वरना क्या दीवारों से भी कोई रिश्ते निभाए जाते है
क्यों मेरी कोई कहानी सुने, कोई क्यों मूझे दिलासा दे
जो चाँद से मोहब्बत करते है, वो रातो में आंसू बहाते है
-तरुण
जुदाई
पहले जो बातें होठो पे आती थी अक्सर
न जाने क्यों अब सीने में घुटी रहती है
जो आते थे ख्वाब रातो में कभी
न जाने क्यों वो आँखों में सिमटे रहते है
सुबह का सूरज भी न जाने क्यों
एक अजीब से बेचैनी लिए आता है
चाँद भी न जाने क्यों
अब चमकते हुए एक
एहसान सा दिखाता है
बस तुम ही तो गए हो
और तो कुछ भी नही बदला
फिर न जाने क्यों सब कुछ बदल गया है
-तरुण
न जाने क्यों अब सीने में घुटी रहती है
जो आते थे ख्वाब रातो में कभी
न जाने क्यों वो आँखों में सिमटे रहते है
सुबह का सूरज भी न जाने क्यों
एक अजीब से बेचैनी लिए आता है
चाँद भी न जाने क्यों
अब चमकते हुए एक
एहसान सा दिखाता है
बस तुम ही तो गए हो
और तो कुछ भी नही बदला
फिर न जाने क्यों सब कुछ बदल गया है
-तरुण
विदा
फिर ऐसे ही
किसी एक मोड़ पे
आंखो में
कुछ ख्वाब छुपाये
चेहरे पे
एक मुस्कान सजाये
हाथो को
तुम्हारी तरफ़ उठाये
मैं तुम्हे
फिर मिलूंगा
किसी एक मोड़ पे
आंखो में
कुछ ख्वाब छुपाये
चेहरे पे
एक मुस्कान सजाये
हाथो को
तुम्हारी तरफ़ उठाये
मैं तुम्हे
फिर मिलूंगा
मंगलवार, 1 अप्रैल 2008
भूले से भी भूल न जाना
भूले से भी भूल न जाना
नींद आए तो ख्वाब में आना
मैंने कब मांगी है खुशियाँ
मुस्कान नही तो आंसू बन आना
हो जब जब रात अमावस
मेरा चाँद तुम्ही बन जाना
जीवन की राहें बहुत मुश्किल है
दूर से ही लेकिन साथ निभाना
मिला लूँ सूर जब मैं खामोशी से
एक नगमा मेरे संग तुम भी गाना
भूले से भी भूल न जाना
-tarun
नींद आए तो ख्वाब में आना
मैंने कब मांगी है खुशियाँ
मुस्कान नही तो आंसू बन आना
हो जब जब रात अमावस
मेरा चाँद तुम्ही बन जाना
जीवन की राहें बहुत मुश्किल है
दूर से ही लेकिन साथ निभाना
मिला लूँ सूर जब मैं खामोशी से
एक नगमा मेरे संग तुम भी गाना
भूले से भी भूल न जाना
-tarun
सोमवार, 31 मार्च 2008
कोई बात हमसे किया करो
हर शाम हमसे मिला करो
कोई बात हमसे किया करो
आए है हम भी तेरे शहर में
एक नज़र हमको भी दिया करो
आँखों में मेरी जो ख्वाब है
उन ख्वाबो में दस्तक किया करो
कभी नाम लेकर बुलाओ हमको
कभी याद हमे भी किया करो
बैठे है हम भी तेरी राह में
देखकर हमको भी कुछ कहा करो
कोई बात हमसे भी किया करो
-तरुण
कोई बात हमसे किया करो
आए है हम भी तेरे शहर में
एक नज़र हमको भी दिया करो
आँखों में मेरी जो ख्वाब है
उन ख्वाबो में दस्तक किया करो
कभी नाम लेकर बुलाओ हमको
कभी याद हमे भी किया करो
बैठे है हम भी तेरी राह में
देखकर हमको भी कुछ कहा करो
कोई बात हमसे भी किया करो
-तरुण
शनिवार, 22 मार्च 2008
कभी मेरी सुनो कभी अपनी कहो
कभी मेरी सुनो कभी अपनी कहो
कुछ बात मगर तुम करती रहो
मिलता रहूँ मैं तुमसे ख्वाबो में
ऐसे मेरी आंखो में तुम सिमटी रहो
होठो पे रहे एक खामोशी
आँखों से तुम सब कहती रहो
मैं बैठकर तुमको देखता रहूँ
तुम धड़कन मेरे दिल की सुनती रहो
आए न कोई फासला कभी दरम्याँ
ये वादा तुम मुझसे करती रहो
कभी मेरी सुनो कभी अपनी कहो ...
-tarun
कुछ बात मगर तुम करती रहो
मिलता रहूँ मैं तुमसे ख्वाबो में
ऐसे मेरी आंखो में तुम सिमटी रहो
होठो पे रहे एक खामोशी
आँखों से तुम सब कहती रहो
मैं बैठकर तुमको देखता रहूँ
तुम धड़कन मेरे दिल की सुनती रहो
आए न कोई फासला कभी दरम्याँ
ये वादा तुम मुझसे करती रहो
कभी मेरी सुनो कभी अपनी कहो ...
-tarun
गुरुवार, 20 मार्च 2008
तुझे साथ मेरा निभाना है
ऐ रात तुझे न ढलने दूंगा, तुझे साथ मेरा निभाना है
कुछ ख्वाबो को जीना है, कुछ उम्मीदों को जगाना है
आसमाँ कि सारी उम्मीदों को एक एक करके संजोना है
कुछ मुस्कानों को जगाना है कुछ भूखे बच्चो को सुलाना है
दुनिया में फैली नफ़रत को एक प्यार का मतलब सिखाना है
कुछ जुबाँ पे फूल खिलाने है कुछ आदमी को इन्साँ बनाना है
वो देता है जब देता है, लेता है तो भी कुछ कहता नही
कुछ उसकी मर्जी से जीना है , कुछ अपनी तक्दीरो को बनाना है
तेरे मेरे इस रिश्ते को एक मायना अभी देना है
कुछ कसमें अभी खानी है , कुछ वादों को निभाना है
-तरुण
कुछ ख्वाबो को जीना है, कुछ उम्मीदों को जगाना है
आसमाँ कि सारी उम्मीदों को एक एक करके संजोना है
कुछ मुस्कानों को जगाना है कुछ भूखे बच्चो को सुलाना है
दुनिया में फैली नफ़रत को एक प्यार का मतलब सिखाना है
कुछ जुबाँ पे फूल खिलाने है कुछ आदमी को इन्साँ बनाना है
वो देता है जब देता है, लेता है तो भी कुछ कहता नही
कुछ उसकी मर्जी से जीना है , कुछ अपनी तक्दीरो को बनाना है
तेरे मेरे इस रिश्ते को एक मायना अभी देना है
कुछ कसमें अभी खानी है , कुछ वादों को निभाना है
-तरुण
मंगलवार, 18 मार्च 2008
लड़कपन की यादें
एक चंचल भँवरे सा जब मैं हवाओ में उड़ता फिरता था
कभी इस बगियाँ में जाता था , कभी उन फूलों पे गिरता था
सपनो में खोया रहता था मैं, जब परियों की बातें करता था
कभी तारो को पकड़ता था, कभी चाँद पे मैं मिलता था
रातो को जागता रहता था मैं, जब सुबह के सपने बुनता था
कभी नींद देर से खुलती थी, कभी बिस्तर से मैं न निकलता था
मैं भी मोहब्बत करता था , जब मैं भी किसी पे मरता था
कभी उसकी गलियों से गुजरता था, कभी मुस्कानों पे उसकी गिरता था
किताबो से भागता रहता था मैं, जब इम्तिहानो से जी चुराता था
कभी पढते पढते सोता था, कभी सोते सोते मैं पढता था
एक चंचल भंवरे सा जब मैं हवाओं में उड़ता फिरता था .....
कभी इस बगियाँ में जाता था , कभी उन फूलों पे गिरता था
सपनो में खोया रहता था मैं, जब परियों की बातें करता था
कभी तारो को पकड़ता था, कभी चाँद पे मैं मिलता था
रातो को जागता रहता था मैं, जब सुबह के सपने बुनता था
कभी नींद देर से खुलती थी, कभी बिस्तर से मैं न निकलता था
मैं भी मोहब्बत करता था , जब मैं भी किसी पे मरता था
कभी उसकी गलियों से गुजरता था, कभी मुस्कानों पे उसकी गिरता था
किताबो से भागता रहता था मैं, जब इम्तिहानो से जी चुराता था
कभी पढते पढते सोता था, कभी सोते सोते मैं पढता था
एक चंचल भंवरे सा जब मैं हवाओं में उड़ता फिरता था .....
बुधवार, 5 मार्च 2008
वो भी क्या दिन थे

वो भी क्या दिन थे , जब आसमानों में परियाँ रहती थी
चाँद ज़मीं पे उतरता था जब दादी माँ कहानियाँ कहती थी
जब नादाँ पंछियों से हम दिन भर चहकते रहते थे
कभी टीचर गुस्सा करती थी, कभी मोहल्ले की शिकायत रहती थी
जब सुबह का सूरज आकर चुपके से हमे जगाता था
रात को जब डैडी कहानी सुनाते थे और माँ सोने को कहती थी
जब छोटी छोटी किताबो में बड़ी बड़ी तस्वीरे होती थी
कभी बादल आँखे दिखाते है कभी नदियाँ आँगन में बहती थी
जब एक झूठे रोने पे सब घंटो मनाते रहते थे
कभी नए खिलोने आते थे कभी ढेरों मिठाईयां मिलती थी
-तरुण
बदलते क्यों है
गुजरते वक्त के साथ , ये रिश्ते बदलते क्यों है
साथ चलना चाहे जिनके, वो बिछड़ते क्यों है
कतरा कतरा मिलकर जो बनते है बादल
बूंद बूंद बनके वो हवाओ में बिखरते क्यों है
वो खेलता है हमसे, कठपुतली से हम है
उसके खेल में दिल के रिश्ते पनपते क्यों है
है एक से सब इन्साँ , है एक सी ही फितरत
ये सरहदों के फासले, फिर इन्हे बांटते क्यों है
वो जिसकी यादें अक्सर रुलाती है हमे
उससे मिलने को हम दिन रात तरसते क्यों है
-तरुण
साथ चलना चाहे जिनके, वो बिछड़ते क्यों है
कतरा कतरा मिलकर जो बनते है बादल
बूंद बूंद बनके वो हवाओ में बिखरते क्यों है
वो खेलता है हमसे, कठपुतली से हम है
उसके खेल में दिल के रिश्ते पनपते क्यों है
है एक से सब इन्साँ , है एक सी ही फितरत
ये सरहदों के फासले, फिर इन्हे बांटते क्यों है
वो जिसकी यादें अक्सर रुलाती है हमे
उससे मिलने को हम दिन रात तरसते क्यों है
-तरुण
मंगलवार, 4 मार्च 2008
याद आता है
वो हर सुबह तुझे ऑफिस में ढूंढना याद आता है
और दिन भर तुझे छुप छुप के देखना याद आता है
वो हर बात पे तुझे फ़ोन करना, तुझसे पूछना और
वो बिना बात के तेरे फ़ोन की घंटी बजाना याद आता है
वो ज़रा ज़रा सी देर में उठकर तेरे करीब से गुजरना
कभी पानी लेने का, कभी गिराने का वो बहाना याद आता है
वो चाये के लिए तुझे बुलाना तेरे करीब जाना और
वो खाने की मेज़ पे तेरे आने तक कुछ न खाना याद आता है
वो घंटो तक बालकनी में खड़े होकर तेरा इंतज़ार करना और
वो तेरे जाने के बाद ऑफिस से निकलना याद आता है
-तरुण
और दिन भर तुझे छुप छुप के देखना याद आता है
वो हर बात पे तुझे फ़ोन करना, तुझसे पूछना और
वो बिना बात के तेरे फ़ोन की घंटी बजाना याद आता है
वो ज़रा ज़रा सी देर में उठकर तेरे करीब से गुजरना
कभी पानी लेने का, कभी गिराने का वो बहाना याद आता है
वो चाये के लिए तुझे बुलाना तेरे करीब जाना और
वो खाने की मेज़ पे तेरे आने तक कुछ न खाना याद आता है
वो घंटो तक बालकनी में खड़े होकर तेरा इंतज़ार करना और
वो तेरे जाने के बाद ऑफिस से निकलना याद आता है
-तरुण
सोमवार, 3 मार्च 2008
बस कमी तुम्हारी है
रात है ख्वाब है नींद की खुमारी है
तुम भी चले आओ, बस कमी तुम्हारी है
नज्म लिए हाथ में, तुझे करूँ याद मैं
लफ्ज़ अधूरे है, कहानी जैसे हमारी है
तू भी कहीं दूर है, दिल भी मजबूर है
धड़कने खामोश है, साँसे कुछ भारी है
हाथ में जाम है लब पे तेरा नाम है
होश नही होश में , क्या हसीं बीमारी है
चाँद भी है यहाँ , रात भी है जवाँ
बहकते हुए हम है दिल में बेकरारी है
-तरुण
तुम भी चले आओ, बस कमी तुम्हारी है
नज्म लिए हाथ में, तुझे करूँ याद मैं
लफ्ज़ अधूरे है, कहानी जैसे हमारी है
तू भी कहीं दूर है, दिल भी मजबूर है
धड़कने खामोश है, साँसे कुछ भारी है
हाथ में जाम है लब पे तेरा नाम है
होश नही होश में , क्या हसीं बीमारी है
चाँद भी है यहाँ , रात भी है जवाँ
बहकते हुए हम है दिल में बेकरारी है
-तरुण
रविवार, 2 मार्च 2008
जाने क्यों ये जाता ही नही
एक साया मेरे साथ है जाने क्यों ये जाता ही नही
तन्हाई का जो वादा है जाने क्यों ये निभाता ही नही
आंखो से छलकते थे मोती, जब याद मुझे वो आते थे
अब उनकी यादों को , जाने क्यों मैं बुलाता ही नही
मेरी बेवफाई के किस्से हर रात वो सबसे कहता है
अपनी कसमें आज भी , जाने क्यों वो निभाता ही नही
कभी खुशी कभी है ग़म, ज़िंदगी की ये रीत है
खुशी आयी मगर, ये ग़म है कि बस जाता ही नही
अब मयकदें में भी हमको मिलती नही शराब
उसका नाम जो लिया, साकी भी अब पिलाता ही नही
-तरुण
शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008
ये कैसा खुदा मिला है
ये कैसा खुदा मिला है जो हर पल बदलता है
रातो को ख्वाब हमे देकर दिन भर उनके साथ चलता है
मैं हर रात उफक पे जाकर सूरज को ढूंढता हूँ
न जाने कहाँ से आए, किस जगह पे ये ढलता है
वो अपनी कसम देकर अपनी मोहब्बत उठा लाये
क्या प्यार मोहब्बत में भी ऐसा सौदा चलता है
वो मेरे घर आकर, पूछे मेरा पता मुझसे
क्या ऐसे दिवानो से कोई ख्वाब अपने बदलता है
वो दरियाँ में जाकर ढूंढते है उसके खतो को
क्या पानी में मिला आंसू, ढूंढे से भी मिलता है
-तरुण
रातो को ख्वाब हमे देकर दिन भर उनके साथ चलता है
मैं हर रात उफक पे जाकर सूरज को ढूंढता हूँ
न जाने कहाँ से आए, किस जगह पे ये ढलता है
वो अपनी कसम देकर अपनी मोहब्बत उठा लाये
क्या प्यार मोहब्बत में भी ऐसा सौदा चलता है
वो मेरे घर आकर, पूछे मेरा पता मुझसे
क्या ऐसे दिवानो से कोई ख्वाब अपने बदलता है
वो दरियाँ में जाकर ढूंढते है उसके खतो को
क्या पानी में मिला आंसू, ढूंढे से भी मिलता है
-तरुण
बस छूकर गुज़र गए
वो आए मेरी मजार पे , और बस गुज़र गए
हम फिर एक बार जीने को थे, फिर एक बार मर गए
एक एक लम्हा जुदाई का गुज़रे एक एक सदी में
कितने बरस तेरे साथ तो बस पल में गुज़र गए
हम हर उस जगह से गुज़रे जहाँ जहाँ तुम गए
तेरी आंखो का नशा देखकर बोतल में भी उतर गए
मेहमाँ तो बहुत आए थे मेरी महफिल में मगर
वो जिस तरफ़ थे, हमे छोड़कर मेहमाँ सब उधर गए
हम शहर की जिस गली से भी गुज़रे, तेरा ही चर्चा था
कड़कती धूप में क्यों छोड़कर हम अपना ये घर गए
-तरुण
हम फिर एक बार जीने को थे, फिर एक बार मर गए
एक एक लम्हा जुदाई का गुज़रे एक एक सदी में
कितने बरस तेरे साथ तो बस पल में गुज़र गए
हम हर उस जगह से गुज़रे जहाँ जहाँ तुम गए
तेरी आंखो का नशा देखकर बोतल में भी उतर गए
मेहमाँ तो बहुत आए थे मेरी महफिल में मगर
वो जिस तरफ़ थे, हमे छोड़कर मेहमाँ सब उधर गए
हम शहर की जिस गली से भी गुज़रे, तेरा ही चर्चा था
कड़कती धूप में क्यों छोड़कर हम अपना ये घर गए
-तरुण
गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008
तेरे कूचे से
तेरे कूचे से जब निकले , एक अपना ही सहारा था
दारियां में बस हम ही थे, न कश्ती थी न किनारा था
वो एक खुदा के आगे, खाती थी सारी कसमे
न कसमें वो उसकी थी, न खुदा वो हमारा था
उस एक रात की खातिर, जिए हम कितनी ज़िंदगी
वो एक दिन हमने कुछ ऐसे मर मर के गुज़ारा था
मैं उस वक्त के ख्वाब , अक्सर रातो को देखता हूँ
जब तुम अजनबी थे, मेरा कोई ख्वाब न तुम्हारा था
वो अजनबियों से जाकर कहता था मेरे किस्से
मेरी मोहब्बत का क़र्ज़ , उसने कुछ इस तरह उतारा था
-तरुण
दारियां में बस हम ही थे, न कश्ती थी न किनारा था
वो एक खुदा के आगे, खाती थी सारी कसमे
न कसमें वो उसकी थी, न खुदा वो हमारा था
उस एक रात की खातिर, जिए हम कितनी ज़िंदगी
वो एक दिन हमने कुछ ऐसे मर मर के गुज़ारा था
मैं उस वक्त के ख्वाब , अक्सर रातो को देखता हूँ
जब तुम अजनबी थे, मेरा कोई ख्वाब न तुम्हारा था
वो अजनबियों से जाकर कहता था मेरे किस्से
मेरी मोहब्बत का क़र्ज़ , उसने कुछ इस तरह उतारा था
-तरुण
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