गुरुवार, 15 जुलाई 2010

रोटी

उस दिन भी चूल्हा चल रहा था
और हम सब उसके आसपास बैठे थे 
माँ एक एक करके रोटी बना रही थी 
कभी छोटे की बारी आती कभी मेरी 
और कभी बाबा की 
मुन्नी तो बस माँ के साथ बैठकर हमे देख रही थी
अचानक से एक शोर आया 
शहर में फिर से दंगा भड़का था 
इस बार तो ये हमारे घर के करीब ही लगता था 
शोर सुनकर हम सब भागे 
माँ से मुन्नी को पकड़ा और बाबा ने हम दोनों को संभाला 
फिर हम सब ऐसे भागे थे 
कि एक एक करके सब खो गये थे 
जब तक होश आया 
तो मैं हिंदुस्तान में था 
माँ बाबा छोटा मुन्नी सब कही रह गये थे 
और वो भूख अब तक लगी हुई थी 
रोटी की अगली बारी मेरी ही तो थी 
न जाने कितने बरस बीत गये 
माँ बाबा छोटा मुन्नी सब 
अब एक ख्वाब सा लगते है 
लेकिन अफ़सोस तो ये है 
कि उस आग में अब तक भी 
न जाने कितने चूल्हे जलते है 
उस दिन हमारा घर जला था 
अब किसी और का जलता है 
कितने बच्चे अब भी अपनों से बिछड़ते है  
बहुत हो गया अब और न आग लगाओ 
मिलकर रहने दो सबको 
हर एक को अपनी रोटी खाने दो 
मेरी तरह वरना कितने 
उस रोटी क़ी भूख को लेकर हर रोज़ मरते रहेंगे  
माँ अब मेरी बारी है रोटी क़ी ....

-तरुण 


शुक्रवार, 21 मई 2010

तेरा ख़त

एक वो भी दिन था
जब तेरे ख़त के आने कि
खबर से ही महक उठते थे
दिन रात मेरे
और एक यह दिन है
तेरा ख़त सामने मेज़ पे पड़ा है
और उसे खोलकर पड़ने की हिम्मत नहीं होती ...

-तरुण

एक मोड़

न जाने कितनी बार
मुड़ मुड़ के रुक रुक के
फिर उस मोड़ पे लौटकर गया हूँ
जिस मोड़ पे तुम मेरा हाथ छुड़ाकर चली गयी थी
न जाने कितनी बार
उस एक एक राह से गुजरा हूँ
जिन पर तुम और मैं साथ चले थे

न कितनी ही बार
उस मोड़ पे घंटो रुक कर तुम्हारा इंतज़ार किया है 
कि शायद तुम भी लौटकर आ जाओ 
मगर हर बार में पहली बार कि तरह 
तनहा उदास लौटा हूँ ...

-तरुण 

बुधवार, 19 मई 2010

रूह

मेरी रूह जो न जाने कबसे खामोश बैठी है
एक बार बोली थी 
कुछ ख़ुशी में गुनगुनायी भी थी 
उस दिन जब तुम 
मेरे करीब आई थी 
मगर उस दिन के बाद 
अब तलक 
न कोई बोल उठा 
न कोई आवाज़ हुई 
बस एक उदास शाम के जैसे 
ये हर रोज़ मेरे घर की छत पे बैठकर 
तेरे आने के दिन गिनती है
और उन रास्तो को देखती है
जहाँ से तुम लौटकर गयी थी
मगर लौटकर आयी नहीं
लेकिन तेरे आने के उस एक दिन 
ये फिर से बोलेगी
फिर से ख़ुशी में कुछ गाएगी 
और एक बार उस हर नज़्म को गुनगुनायेगी 
जो तेरे जाने के बाद आज तक 
लिखी तो है मगर मुकम्मल न हुई 


-तरुण  

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

ज़िन्दगी की रफ़्तार

ज़िन्दगी की रफ़्तार कुछ ऐसी होती है
कि कभी पल दो पल में
साल गुज़र जाते है
और कभी
पल दो पल ही साल बन जाते है
कभी सालो को गिनना
बहुत आसान हो जाता है
और कभी
पलों को गिनते गिनते ज़माने गुज़र जाते है
ज़िन्दगी कि रफ़्तार कुछ ऐसी होती है
कि कभी पल दो पल के ख्वाब
ज़िन्दगी भर को महका जाते है
और कभी न जाने कितने बरस
बस यादों में रह जाते है
ज़िन्दगी कि रफ़्तार कुछ ऐसी होती है
कि अक्सर बचपन के दिन
आँखों में रह जाते है
और बुडापे के दिन
आखिरी साँसों तक साथ निभाते है
ज़िन्दगी के दिन इतने अजीब होते है
कि इसको समझने से पहले यह ख़त्म हो जाते है
बस हम एक ज़िन्दगी में
नासमझ रह जाते है ....


-तरुण

बुधवार, 17 मार्च 2010

बीत गए

तुमको देखे ज़माने बीत गए
प्यार के दिन सुहाने बीत गए

जाम उठाकर कैसे भूलेंगे तुम्हे
मय गयी महखाने बीत गए

रोये भी तो अब कौन सुनेगा हमे
रोने के सब बहाने बीत गए

कहाँ जाकर मिलेंगे तुझे यह बता
छिपने के सब ठीकाने बीत गए

मैं भी चुप हूँ तू भी गुमसुम है
तेरे गीत मेरे तराने बीत गए

-तरुण

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

किसी तरह

ये रात बिना नींद के गुजर जाये किसी तरह
सुबह के साथ तू भी मेरे घर आये किसी तरह

तडपते चाँद को रात ने बहलाया है बार बार
मूझे बस तेरा एक ख्वाब मिल जाये किसी तरह

मेरी हर आवाज़ तेरे दर से खाली लौट आती है
कभी एक पुकार पे तू भी आ जाये किसी तरह

मैं लोगो कि भीड़ में अक्सर खोया रहता हूँ
कभी किसी भीड़ मैं तू भी खो जाये किसी तरह

छोटी छोटी उम्मीदों से मैंने कितने आस्मां सजाये है
एक तेरा चाँद बस मेरी गली उतर जाये किसी तरह ..

-तरुण

रविवार, 31 जनवरी 2010

रिश्ता

मैं जिससे भी मिलता हूँ
उसके जैसा हो जाता हूँ
उसके ख्यालो को सोचता हूँ 
उसकी आहटो पे चलता हूँ 
उसकी आवाजो मैं बोलता हूँ 
कोई फिर भी  क्यूँ 
मेरी तरह नहीं सोचता है ...

मैं उसके गीतों को सुनता हूँ
उसकी साँसों को जीता हूँ 
उसके नगमे गाता हूँ 
उसके सपनो को लेता हूँ
कोई फिर भी क्यूँ
मेरी तरह नहीं सोचता है...

-तरुण 


शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

अमन की आशा

Written in context of India and pakistan, for someone who was born in pakistan but migrated to india in 47, today he remember the days spent in pakistan, his original home

वही तो घर मेरा था
वही पे पहली दफा मैं
माँ का हाथ पकड़कर कुछ कदम चला था
वही पे पहली दफा मैंने
स्कूल में जाकर कुछ तो लिखा था
वही तो घर मेरा था
वही पे मैंने सब ख्वाब देखे थे
वही पे हर एक रिश्ता बुना था
वही तो घर मेरा था
आज वो सब बिछड़ गया है
बदल गयी सरहदों की लकीरे
आज भी मगर कुछ तो जुडा है
वही तो जो कल मेरा था आज भी वो मेरा है


-तरुण 

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

फुर्सत नहीं मिलती

कभी ज़िन्दगी जीते जाने से फुर्सत  नहीं मिलती
कभी इसके गम भुलाने से फुर्सत नहीं मिलती

कभी तुम रूठी रहती हो तो एहसास नहीं होता
कभी तुझको मनाने से फुर्सत नहीं मिलती

कभी मेरी तरफ आ जाती है जन्नत की सदाएँ भी
कभी एक आहट जगाने से फुर्सत नहीं मिलती

कभी इन आँखों में मिलती है खुशियाँ ज़माने की
कभी अश्को को बहाने से फुर्सत नहीं मिलती 

कभी प्यालो मैं उतरते है मयक़दे शहर भर के
कभी एक जाम पी जाने से फुर्सत नहीं मिलती

कभी रात भर बैठकर चाँद से मैं तेरी बाते करता हूँ
कभी एक तेरा नाम लिए जाने से फुर्सत नहीं मिलती

-तरुण

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

उम्मीद

न जाने कितनी बार
गिरा था मैं
मगर हर बार
कभी पल दो पल में
और कभी कुछ देर ठहरकर
मैं उठ जाता था
और चल निकलता था अपने रास्तो पे
मगर उस दिन जब तुमने
मेरा हाथ छोड़ा था
मैं कुछ ऐसे गिरा था
कि अब तक नहीं उठ पाया हूँ
और अब तक गिरा हुआ मैं
बस एक दुआ मांगता हूँ
एक बार फिर से आकर
वैसे ही मुस्कुराकर
तुम अपना हाथ दे दो
तो मैं फिर उठ जाऊँगा
और मेरी यह ज़िन्दगी बच जाएगी ...

-तरुण

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

I miss you India

यूँ तो सुबह यहाँ भी होती है
लेकिन सूरज चिड़ियों के संग
जहाँ घर घर जाकर सबको जगाता है
वो मेरा भारत है
यूँ तो दिन यहाँ भी गुजरता है
लेकिन जहाँ दिन का हर पल
हमारे साथ मिलकर शोर मचाता है
वो मेरा भारत है
यूँ तो शाम यहाँ भी ढलती है
लेकिन सुकून जहाँ शाम के साथ
हर नुक्कड़ हर घर मैं लौटकर आता है
वो मेरा भारत है
यूँ तो रात यहाँ भी जगती है
लेकिन जहाँ चाँद रात को
सबके लिए एक लौरी गाता है
वो मेरा भारत है
यूँ तो साल यहाँ भी जाते है
लेकिन जहाँ हर साल कितनी
यादो के मीठे से लम्हे दे जाता है
वो मेरा भारत है
यूँ तो ज़िंदगियाँ लोग यहाँ भी जीते है
लेकिन जहाँ इंसाँ  जीवन के हर
रस को पीकर जाता है
वो मेरा भारत है

I miss you india ....

तरुण

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

त्रिवेणी

तेरे रिश्ते को कब का दफ़न कर आया हूँ
फिर भी तेरा एहसास है कि जाता नहीं

रिश्तो कि भी शायद कोई रूह होती होगी

                *****

तेरी हर एक याद को दरियां में बहा आया हूँ
तेरी हर आहट को ख़ामोशी में सुला आया हूँ

आजकल बहुत अकेला अकेला सा लगता है

              *****

एक बार रोते हुए माँ से चाँद को माँगा था
अब हर रात खुदा से एक तुझे मांगता हूँ

काश एक बार चाँद मेरे आँगन में उतर आये

              *****

एक खंजर सा उतरता है सीने में
जब जब याद तुम्हारी आती है

कुछ रिश्ते खून से लिखे होते है

          ******

कागज़ की किश्ती लिए एक दिन मैं
तेरा नाम लेकर समंदर में उतर गया था

वो समंदर अब तक मेरी आँखों से टपकता है

       *******
तरुण

सोमवार, 2 नवंबर 2009

सड़के

हर रोज़ सुबह शाम
जिन सडको पे मैं
चलता हूँ दौड़ता हूँ
और अक्सर अपनी कार में
एक्सिलेरटर पे पैर लगाये
मैं सब तरफ भागता हूँ
उन सडको से कभी कभी
पल दो पल में रुक कर
पूछ लेता हूँ
क्या वो गुजरी है इस तरफ से
जानता तो हूँ
और यह अच्छी तरह से मालूम भी है
कि तुम  न आओगी इस तरफ कभी
फिर भी शायद किसी रोज़
क्या पता
अनजाने में यूँही कुछ सोचते हुए
तुम गुज़र जाओ इन सडको से कभी
जिन सडको पे मैं दिन रात घूमता हूँ
भूली हुई सी तुम्हारी कुछ यादें लेकर ...

-तरुण

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

सुबह

हजारों रातों को जलाकर
लाखो ख्वाबो को बनाकर
न कितने लम्हों के
एक एक तागें को पिरोकर
जिस सुबह को सजाया था
वो आज मिली है
आ मेरी उम्मीदों की दुल्हन
ज़रा कुर्सी पे मेरे सामने बैठ
कुछ देर मुझसे बात कर
मैं भी देखूं
जिसने इतना तरसाया है
न जाने कितनी रातो को जगाया है
वो सुबह कैसी है ...

-तरुण

बुधवार, 15 जुलाई 2009

वरना ये दुनिया अधूरी है

तू मेरी है मैं तेरा हूँ
फिर भी सनम क्यूँ ये दूरी है
तू पास है मेरे, मेरे साथ है तू
फिर भी क्या मजबूरी है
तुम कहो जो भी कहना है
लेकिन चुप रहना भी ज़रूरी है
हम साथ है तो ये जहाँ है हँसी
वरना ये दुनिया भी अधूरी है
तू मेरी है मैं तेरा हूँ ....

-तरुण

शुक्रवार, 26 जून 2009

एक बार

अपनी ज़िन्दगी को छोड़कर
अपनी हर खुशी को छोड़कर
जो बैठे है
बस एक तेरा नाम लेकर
एक बार
उनकी तरफ़ भी
आंखे उठाकर
मुस्कुराकर देख लो

देखना फिर
न जाने कितनी
आंखे जगमगाती है
न जाने कितने चेहरे खिल जाते है
और न जाने कितनी जिन्दगियाँ संवर जाती है


-तरुण

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

वो यहीं कहीं है

गर्मी की धूप से जलती धरती पर जब
बारिश की ठंडी बूंदे गिरती है
तब अह्सास होता है

सर्दी की ठंडी सुबह को जब कोहरे को चीरकर
कुछ नरम सूरज की किरने निकलती है
तब अह्सास होता है

बहार के मौसम में छोटे छोटे पौधों पर जब
नन्ही नन्ही कलियाँ खिलती है
तब अह्सास होता है

नन्हे छोटे बच्चो के मुख पर जब
पहली मुस्कान उभरती है
तब अह्सास होता है

जब बरसो से हारे इंसान को कुछ
उम्मीद की किरणे दिखती है
तब अह्सास होता है

जब कुछ लम्हों को जीतकर "मैं" उससे बड़ा होने लगता है
पर जब उस विश्व विजयेता पर भी वक्त की बिजली गिरती है
तब अह्सास होता है
कि वो है यहीं कहीं है हमें देख रहा है

-तरुण

गुरुवार, 12 मार्च 2009

इंतज़ार

आधी ज़िन्दगी तो गुज़र गयी
इसी इंतज़ार में कि तुम आओगी
तुम्हारी उम्मीद पे कितनी ही राते जल गयी
न जाने कितने चाँद तुम्हारे इंतज़ार में बुझ गए
वो बरसो से सुबह जो आकर मेरे कानो में कहती थी
कि आज तो वो आएगी
वो भी बस अब थक गयी है
ये सदियों से दिन काटते काटते मैं भी कटता जा रहा हूँ
हर लम्हा मैं अहिस्ता अहिस्ता टूटता जा रहा हूँ
कहाँ हो तुम चली आओ
इतना इंतज़ार क्या काफ़ी नही इस ज़िन्दगी के लिए ...

-तरुण

मंगलवार, 10 मार्च 2009

मुझसे पूछिये

होता है क्या हिज्र-ए-ग़म मुझसे पूछिये
दिल में क्यूँ है ज़ोर-ए-सितम मुझसे पूछिये

दरवाज़े पे खड़े हो मगर दस्तक न कीजिए
इस घर में वो अब रहते है कम मुझसे पूछिये

हाथ क्यूँ बढाता है यूँ अजनबियों की तरफ़
अपनों के लिए कब उठे कदम मुझसे पूछिये

खुदा से क्या कहूँ की वो भी न मेरा हुआ
मेरे पास है बस मेरे ही ग़म मुझसे पूछिये

कबसे खामोश छुपाये बैठा हूँ हर दर्द को मैं
हर आवाज़ पे उठते है ये जख्म मुझसे पूछिये

-तरुण

सोमवार, 9 मार्च 2009

दिन शराब के

तुम क्या गए फिर लौट आए दिन शराब के
भीगती साँसे डूबती आँखे दिल-ऐ-बेताब के

रातो को बरसते है बादल कुछ ऐसे टूटके
छलक जाते है शब-ऐ-ग़म अश्क माहताब के

मत जाना चमन में कि माहौल ठीक नही
बहकी है कलियाँ बदले है मिजाज़ गुलाब के

मयक़दे में भी गए मगर तेरा ज़िक्र न गया
पैमानों में भी उतरे है रंग इक तेरे शबाब के

इतना नासमझ न बन, न और उम्मीद कर
तेरे अश्को से न बदलेंगे लफ्ज़ उसके जवाब के

-तरुण

गुरुवार, 5 मार्च 2009

सालगिरह

आओ इस सालगिरह पे
हम वक्त की मुठ्ठी को खोलकर
उस हर लम्हे को निकाले
जब हम साथ में मुस्कुराये थे
उस हर एक लफ्ज़ को फिर से बोले
फिर से उस हर एक वादे को दोहराएँ
जो मैंने तुमसे और तुमने मुझसे किया था
इस सालगिरह पे चलो
हम अपनी कसमो की फिर गठडी खोले
और अपनी उन कसमो को
फिर से उठा ले
फिर से उनको कुछ साँसे देदे
जो साथ रहकर हमने खाई थी
आओ इस सालगिरह पे
हम अपने अतीत की हर मीठी याद को लेकर
अपने नए कल की सुबह को सजाये
आओ इस सालगिरह पे हम अगली सालगिरह को
एक अनोखा तोहफा देकर जाए
ऐसे हम अपनी सालगिरह मनाये

-तरुण

बुधवार, 4 मार्च 2009

मौसम बदल गए

हम इस कदर तेरी जुल्फ के सायें में ढल गए
अपना ही पता ढूंढने हम घर से निकल गए

तुमसे उठी है बात तो अब तुम ही जवाब दो
क्यूँ ऐसे तुम्हे देखकर सब मौसम बदल गए

यूँ तो बहुत करीब था तेरे घर का फासला
अपने ही दरवाज़े पे लेकिन हम फिसल गए

आँखों से न दो जवाब जब होठो की बात हो
आँखों से सुनी है जब भी तो हम मचल गए

रात भर शराब पीते रहे पर होश न गया
बोतल में तुम्हे देखकर हम ऐसे संभल गए


-तरुण

मंगलवार, 3 मार्च 2009

खुदा तू भी इतना परेशाँ निकला

मेरे दर्द-ए-इश्क का इक निशाँ निकला
ओ चाँद तू भी बड़ा बेईमाँ निकला

मैं जिसकी रात भर राह देखता रहा
वो तो मेरी मय्यत का कारवाँ निकला

कल मैंने खंजर से जिसको कत्ल किया
वो तो मेरा एक पुराना रहनुमाँ निकला

मैं जिसकी आवाज़ के लिए तरसता था
वो मेरा सनम बरसों का बेजुबाँ निकला

मैं क्यूँ तुझको सुनाता था दास्ताँ अपनी
ओ खुदा तू भी तो मुझ सा परेशाँ निकला

वो जो ज़माने भर का मसीहा बनता था
वो भी अन्दर से टूटा हुआ इंसाँ निकला

-तरुण

रविवार, 1 मार्च 2009

इक तेरा ग़म

इक तेरा ग़म सह सहकर हम कल रात भर रोते रहे
आँखों की तरह शब को भी हम अश्को में डुबोते रहे

तेरा जाना हमे मंज़ूर था तेरा जाना हम पी भी गए
तेरी यादों का पर जो सुरूर है उसमे बस हम खोते रहे

वादा किया भूल गए तुम ख्वाब में भी न हमसे मिले
तेरे इक ख्वाब की उम्मीद में हम कितने दिन सोते रहे

इक तेरा रिश्ता था बहुत ये दुनिया कब हमे मंजूर थी
तुम ही कहो क्यूँ अब तेरे बिन सब मेरे अपने होते रहे

क्या कहूँ कैसे कहूँ मेरे लफ्ज़ तो जैसे सब बुझ गए
तेरी आवाजो को लेकिन हम इन सांसो में पिरोते रहे

इक तेरा ग़म सह सहकर हम कल रात भर रोते रहे ...


-तरुण